श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०७ ) अब तक-चेतन भोग्य ,जडस्वभाव, सत्त्वरज तमोमय प्रधान से, पूर्वजिज्ञासित ब्रह्म की व्यावृत्ति (पृथकता) बतलाई गई । अब शुभाशुभ कर्मों से वशीभूत,त्रिगुणात्मक प्रकृति संबंध से अनेक प्रकार के दुःखों के सागर में निमग्न, बद्ध और मुक्त जीवों से, ब्रह्म की पृथकता, हेयगुण रहित और निरतिशय आनंद रूप से बतलाई जावेगी । आनन्दमयोऽभ्यासात् १।१।१३॥ तैत्तरीया अधीयते “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इति प्रकृत्य “तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरआत्मा आनंदमयः” इति । तत्र सन्देहः-किमयानंदमयोः बंधमोक्षभागिनः प्रत्यगा- त्मनो जीवशब्दाभिलपनीयादन्यः परमात्मा, उत स एव ? इति । तैत्तरीयोपनिषद् में “वह पुरुष अन्नरसमय है” ऐसा कहकर इस विज्ञानमय से भी सूक्ष्म एक दूसरा अन्तरात्मा आनंदमय है” ऐसा कहागया । इस पर संदेह होता है कि-यह आनंदमय कौन है ? बंधन मुक्ति वाला प्रत्यगात्मा जो कि जीव नाम से जाना जाता है, वह है अथवा उससे श्रेष्ठ परमात्मा है ? किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? “तस्यैष एव शारीर आत्मा” इत्यानन्दमयस्य शारीरत्वश्रवणात् । शारीरो हि शरीर संबंधी जीवात्मा एव । दोनों में कौन हो सकता है ? विचारने पर तो जीवात्मा ही प्रतीत होता है, क्योंकि-“वह शरीर धारक ही यह आत्मा है” इस वाक्य में आनंदमय के लिए शरीर कहा गया है । शरीर संबंधी जीवात्मा ही, निश्चित होता है । ननु च जगत कारणतया प्रतिपादितस्य ब्रह्मणः सुखप्रति- पत्त्यर्थमन्नमयादीननुक्रम्य तदेव जगत्कारणमानंदमय इत्युपदिशति, जगत्कारणं च “तदैक्षत” इतीक्षणश्रवणात् सर्वज्ञः सर्वेश्वरः इत्युक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com