श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८८ ) (प्रतिवाद) नही; जगत कारण के रूप से प्रतिपादित ब्रह्म को सरलता पूर्वक जाना जा सके इसलिए अन्नमयादि रूपों से कहते हुए अंत में आनंदमय को ही जगत का कारण बतलाया गया और उसकी जगत् कारणता को, “उसने संकल्प किया” इस वाक्यगत ईक्षण क्रिया के आधार पर उसे सर्वज्ञ सर्वेश्वर बतलाते हुए सिद्ध किया गया है । सत्यमुक्तम्—स तु जीवान्नातिरिच्यते—“अनेन जीवेनात्मनाऽनु- प्रविश्य”—“तत्त्वमसि श्वेतकेतो” इति कारणतया निर्दिष्टस्य जीव सामानाधिकरण्यनिर्देशात् । सामानाधिकरण्यं हि एकत्वप्रति- पादनपरम् । यथा “सोऽयं देवदत्तः” इत्यादौ । ईक्षापूर्विका च सृष्टिश्चेतनस्य जीवस्योपपद्यत एव । अतः 'ब्रह्मविदाप्नोतिपरं” इति जीवस्याचित्संसर्गवियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतयोपदिश्यते । अचिद्वियुक्तस्वरूपस्य लक्षणमिदमुच्यते—“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति । तद्रूपप्राप्तिरेव हि मोक्षः । “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रिया- प्रियोरपहतिरस्ति, अशरीरंवाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । श्रतो जीवस्याविद्यावियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतया प्रक्रान्तमानंदमय इत्युपदिश्यते । (वाद) आप तो ठीक कह रहे हैं—वह ब्रह्म जीव से भिन्न है कहाँ ? जैसा कि—“जीव ब्रह्म से स्वयं प्रविष्ट होकर” तथा “श्वेतकेतु तू वही है” इन वाक्यों में कारण रूप से निर्दिष्ट जीव रूप का सामाना- धिकरण्य दिखलाया गया है । अभिन्नता का प्रतिपादन ही सामानाधिरण्य है । जैसेकि “यह वही देवदत्त है” इत्यादि में सामानाधिकरण्य दिखलाया जाता है ईक्षा पूर्विका सृष्टि चैतन्य जीव की ही बतलाई गई है । “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” ऐसे जीव के, जडसंसर्ग रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाया गया है । जड संसर्ग रहित स्वरूप का लक्षण इस प्रकार बतलाया गया कि—“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” । वस्तुतः उस ब्रह्म के रूप की प्राप्ति ही तो मोक्ष है । जैसा कि इस वाक्य से स्पष्ट हो जाता है—‘शुभ और अशुभ जन्य पाप पुण्य, शरीर रहते हुए समाप्त ankurnagpal108@gmail.com