भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३०६ ) नही होते, शरीर रहित होने पर पाप पुण्य (जीव का) स्पर्श नहीं कर सकते।” इससे ज्ञात होता है कि-जीव के अविद्या रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाते हुए उसे ही आनंदमय बतलाया गया है। तथा हि-शाखाचन्द्रन्यायेनात्मस्वरूपं दर्शयितुं “अन्नमयः पुरुषः” इति शरीरं प्रथमं निर्दिश्य तदन्तर्भूतं तस्य धारकं पञ्चवृत्तिप्राणं, तस्याप्यन्तर्भूतं मनः, तदन्तरभूतां च बुद्धिं, “प्राणमयो-मनोमयो-विज्ञानमयो” इति तत्र तत्र बुद्ध्यवतरणक्रमेण निर्दिश्य, सर्वान्तिर्भूतं जीवात्मानं “अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” इत्युपदिश्य अन्तरात्मपरम्परां समापयति । अतो जीवात्मस्वरूपमेव “ब्रह्मविदाप्नोति” इति प्रक्रान्तं ब्रह्म, तदेवानन्दमय इत्युपदिष्टमिति निश्चीयते । तथा शाखा चन्द्र न्याय से आत्मा के स्वरूप को बतलाने के लिए “अन्नमयः पुरुषः” कहकर सर्व प्रथम स्थूल शरीर को बतलाकर, उसके अन्तर्भूत, उसके धारक पंच प्रवृत्ति वाले प्राण प्राणके अन्तर्भूत मन और उसके अन्तर्भूत बुद्धि को “प्राणमय मनोमय विज्ञानमय” रूप से बुद्धि ग्राह्य कराते हुए, सबके अन्तर्भूत जीवात्मा को “अन्योऽन्तर आत्मा आनंदमयः” बतला कर अन्तरात्म परम्परा के उपदेश को समाप्त किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-जीवात्मा ही “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” इस नियम के अनुसार, प्राप्य ब्रह्म है, उसे ही आनन्दमय रूप से बतलाया गया है। ननु च-“ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा” इत्यानन्दमयादन्यद्ब्रह्मेति प्रतीयते । नैवं-ब्रह्मैव स्वस्वभावविशेषेण, पुरुषविधत्वरूपितं शिरः पक्षपुच्छरूपेणाप्यपदिश्यते । यथा अन्नमयो देहोऽवयवी स्वस्माद- नतिरिक्तैः स्ववाक्यैरेव “तस्येदमेव शिरः” इत्यादिना शिरः-पक्ष-पुच्छ वत्तया निदर्शितः । तथा आनंदमयं ब्रह्मापि स्वस्मादनतिरिक्तैः प्रियादिभिर्निदर्शितम् । तत्रावयवत्वेन निरूपितानां प्रिय-मोद प्रमो- ankurnagpal108@gmail.com