श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०५ ) न॑ाशब्दम्-इत्यादिभिः सूत्रैः प्रतिपाद्यते । चेतनत्वं नाम चैतन्यगुणयोगः। अत ईक्षणगुणविरहिणः प्रधानतुल्यत्वमेव ऐसे ही, निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म का पोषक शांकरमत भी सूत्रकार द्वारा प्रस्तुत इन श्रुतियों से निरस्त जानना चाहिए, क्यों कि-सूत्रकार ने वास्तविक ईक्षण आदि गुण संपन्न ब्रह्म को ही जिज्ञास्य ब्रह्म रूप से सिद्ध किया है। निर्विशेषवाद में, अवास्तविक साक्षीवाले ब्रह्म को वेदांतवेद्य जिज्ञास्य, सिद्ध किया गया है। और उसे ही चेतन रूप से “ईक्षतेर्नाशब्दम्" इत्यादि सूत्रों से समर्थन किया गया है। जब कि- चैतन्यगुणयोग ही चैतन्यता है, तब यदि ये लोग ईक्षण को गुण नहीं मानते तो इनका मत भी प्रधानकारणवादी सांख्य के समान ही अप्रामाणिक है। किंच-निर्विशेषप्रकाशमात्रब्रह्मवादे तस्य प्रकाशत्वं अपि दुरुपपादम् । प्रकाशो हि नाम स्वस्य परस्य च व्यवहारयोग्यता- मापायन् वस्तुविशेषः । निर्विशेषस्य वस्तुनस्तदुभयरूपत्वाभावात् घटादिवाचित्वमेव । तदुभयरूपत्वाभावेऽपि तत्क्षमत्वमस्तीति चेत्, तन्न, तत्क्षमत्वं हि तत् सामर्थ्यमेव । सामर्थ्यगुणयोगे हि निर्विशेष- वाद : परित्यक्तःस्यात् । एक बात और है कि-ब्रह्म को निर्विशेष प्रकाशमात्र कहने से उसके प्रकाशत्व का उपपादन नहीं होता क्यो कि- स्वतःऔर दूसरे की व्यवहारयोग्यता संपादक वस्तु विशेष को प्रकाश कहते हैं। इस प्रकार प्रकाशत्व एक गुण हो जाता है जो कि-निर्विशेष वस्तु की भी जडता ही सिद्ध होती है। यदि कहा जाय कि- स्व-परव्यवहार्यता रूप अवस्थाओं के विना भी निर्विशेष में प्रकाशन क्षमता है,तो ऐसा कथन भी उक्त मत के विरुद्ध होगा, क्यों कि- क्षमता भी एक गुण ही तो है। इसलिए निर्विशेषमत भी त्याज्य है । अथ श्रुतिप्रामाण्यादयमेको विशेषोऽभ्युपगम्यत, इति चेत्,हन्त तर्हि तत एव सर्वज्ञता, सर्वशक्तित्वं' सर्वेश्वरत्वं, सर्वकल्याणगुणा-