श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०४ ) त्मा''-''विश्वात्मानं परायणम्''-''पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्''-यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः-“एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एकोनारायणः” इत्यादीनि । तस्माज्जगत्कारणवादिवाक्यं न प्रधानादिप्रतिपादनयोग्यम् । अतः सर्वज्ञः सर्वेश्वरो निरस्ता- निखिलदोषगन्धोऽनवधिकातिशय असंख्येयकल्याणगुणगणौघम- हार्णवः पुरुषोत्तमो नारायण एव निखिल जगदेककारण जिज्ञास्य ब्रह्मेति स्थितम् । तथा अन्य श्रुतियाँ भी-“इस जगत में उनका कोई स्वामी और शासक नहीं है न उनका ज्ञापक कोई चिन्ह ही है वही एकमात्र कारणा- धिपतियों के अधिपति हैं उनका कोई अधिपति जनक या प्रतिपालक नही है। वह धीर (अविकृतात्मा) ईश्वर ही समस्त रूप संपन्न वस्तुओं का विस्तार करके,उन वस्तुओं का नाम तथा नामों का व्यवहार करके, उनमें स्थित है। वही प्राणिमात्र के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर, शासन करते हैं, इसलिए सर्वात्मा हैं। विश्वात्मा, परमाश्रय, जगत्पति, आत्मा के स्वामी को जानो । इस जगत में जो कुछ भी पदार्थ दीखते या सुनाई पड़ते हैं, नारायण उन सब में बाहर और भीतर विद्यमान हैं। ये नारायण ही प्राणिमात्र के अन्तरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, प्रकाशमय और एक है।” इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सर्वेश्वर, निर्दोष, असंख्य अपरिमित अपार कल्याणकर गुणों के महासागर पुरुषोत्तम नारायण को ही समस्त जगत का एकमात्र कारण बतलाती हैं, वही जिज्ञास्य ब्रह्म हैं। उक्त जगत् कारणादि के बोधक वाक्य, प्रधानादि के प्रतिपादन के योग्य कदापि नहीं हैं। अतएव निर्विशेषचिन्मात्रब्रह्मवादोऽपि सूत्रकारेण आभिः श्रुतिभिः निरस्तो वेदितव्यः, पारमार्थिकमुख्येक्षणादिगुणयोगि जिज्ञा- स्यं ब्रह्मेति स्थापनात् । निर्विशेषवादे हि साक्षित्वमप्यपारमार्थिकं वेदांतवेद्यंब्रह्म जिज्ञास्यतयाऽप्रतिज्ञातम् । तच्च चेतनमिति ईक्षते- ankurnagpal108@gmail.com