श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३०४ ) त्मा''-''विश्वात्मानं परायणम्''-''पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्''-यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः-“एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एकोनारायणः” इत्यादीनि । तस्माज्जगत्कारणवादिवाक्यं न प्रधानादिप्रतिपादनयोग्यम् । अतः सर्वज्ञः सर्वेश्वरो निरस्ता- निखिलदोषगन्धोऽनवधिकातिशय असंख्येयकल्याणगुणगणौघम- हार्णवः पुरुषोत्तमो नारायण एव निखिल जगदेककारण जिज्ञास्य ब्रह्मेति स्थितम् । तथा अन्य श्रुतियाँ भी-“इस जगत में उनका कोई स्वामी और शासक नहीं है न उनका ज्ञापक कोई चिन्ह ही है वही एकमात्र कारणा- धिपतियों के अधिपति हैं उनका कोई अधिपति जनक या प्रतिपालक नही है। वह धीर (अविकृतात्मा) ईश्वर ही समस्त रूप संपन्न वस्तुओं का विस्तार करके,उन वस्तुओं का नाम तथा नामों का व्यवहार करके, उनमें स्थित है। वही प्राणिमात्र के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर, शासन करते हैं, इसलिए सर्वात्मा हैं। विश्वात्मा, परमाश्रय, जगत्पति, आत्मा के स्वामी को जानो । इस जगत में जो कुछ भी पदार्थ दीखते या सुनाई पड़ते हैं, नारायण उन सब में बाहर और भीतर विद्यमान हैं। ये नारायण ही प्राणिमात्र के अन्तरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, प्रकाशमय और एक है।” इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सर्वेश्वर, निर्दोष, असंख्य अपरिमित अपार कल्याणकर गुणों के महासागर पुरुषोत्तम नारायण को ही समस्त जगत का एकमात्र कारण बतलाती हैं, वही जिज्ञास्य ब्रह्म हैं। उक्त जगत् कारणादि के बोधक वाक्य, प्रधानादि के प्रतिपादन के योग्य कदापि नहीं हैं। अतएव निर्विशेषचिन्मात्रब्रह्मवादोऽपि सूत्रकारेण आभिः श्रुतिभिः निरस्तो वेदितव्यः, पारमार्थिकमुख्येक्षणादिगुणयोगि जिज्ञा- स्यं ब्रह्मेति स्थापनात् । निर्विशेषवादे हि साक्षित्वमप्यपारमार्थिकं वेदांतवेद्यंब्रह्म जिज्ञास्यतयाऽप्रतिज्ञातम् । तच्च चेतनमिति ईक्षते- ankurnagpal108@gmail.com
( ३०५ ) न॑ाशब्दम्-इत्यादिभिः सूत्रैः प्रतिपाद्यते । चेतनत्वं नाम चैतन्यगुणयोगः। अत ईक्षणगुणविरहिणः प्रधानतुल्यत्वमेव ऐसे ही, निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म का पोषक शांकरमत भी सूत्रकार द्वारा प्रस्तुत इन श्रुतियों से निरस्त जानना चाहिए, क्यों कि-सूत्रकार ने वास्तविक ईक्षण आदि गुण संपन्न ब्रह्म को ही जिज्ञास्य ब्रह्म रूप से सिद्ध किया है। निर्विशेषवाद में, अवास्तविक साक्षीवाले ब्रह्म को वेदांतवेद्य जिज्ञास्य, सिद्ध किया गया है। और उसे ही चेतन रूप से “ईक्षतेर्नाशब्दम्" इत्यादि सूत्रों से समर्थन किया गया है। जब कि- चैतन्यगुणयोग ही चैतन्यता है, तब यदि ये लोग ईक्षण को गुण नहीं मानते तो इनका मत भी प्रधानकारणवादी सांख्य के समान ही अप्रामाणिक है। किंच-निर्विशेषप्रकाशमात्रब्रह्मवादे तस्य प्रकाशत्वं अपि दुरुपपादम् । प्रकाशो हि नाम स्वस्य परस्य च व्यवहारयोग्यता- मापायन् वस्तुविशेषः । निर्विशेषस्य वस्तुनस्तदुभयरूपत्वाभावात् घटादिवाचित्वमेव । तदुभयरूपत्वाभावेऽपि तत्क्षमत्वमस्तीति चेत्, तन्न, तत्क्षमत्वं हि तत् सामर्थ्यमेव । सामर्थ्यगुणयोगे हि निर्विशेष- वाद : परित्यक्तःस्यात् । एक बात और है कि-ब्रह्म को निर्विशेष प्रकाशमात्र कहने से उसके प्रकाशत्व का उपपादन नहीं होता क्यो कि- स्वतःऔर दूसरे की व्यवहारयोग्यता संपादक वस्तु विशेष को प्रकाश कहते हैं। इस प्रकार प्रकाशत्व एक गुण हो जाता है जो कि-निर्विशेष वस्तु की भी जडता ही सिद्ध होती है। यदि कहा जाय कि- स्व-परव्यवहार्यता रूप अवस्थाओं के विना भी निर्विशेष में प्रकाशन क्षमता है,तो ऐसा कथन भी उक्त मत के विरुद्ध होगा, क्यों कि- क्षमता भी एक गुण ही तो है। इसलिए निर्विशेषमत भी त्याज्य है । अथ श्रुतिप्रामाण्यादयमेको विशेषोऽभ्युपगम्यत, इति चेत्,हन्त तर्हि तत एव सर्वज्ञता, सर्वशक्तित्वं' सर्वेश्वरत्वं, सर्वकल्याणगुणा-
( ३०६ ) करत्वं सकलहेयप्रत्यनी`त्यादयः सर्वेऽभ्युपगन्तव्याः । शक्तिमत्व च कार्यविशेषानुगुणत्वं, तच्चकार्यविशेषनिरूपणीयम्, कार्यविशेषस्य निष्प्रमाणकत्वे तदेकनिरूपणीय शक्तिमत्वमपि निष्प्रमाणकं स्यात् । यदि यह कहो कि-श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर हम उनके क्षमता- गुण को स्वीकार करते हैं, तब तो प्रसन्नता का विषय है तब तो सर्व- ज्ञता, सर्वेश्वरता, शक्तिमत्ता, सर्वकल्याणगुणाकरता निर्दोषता आदि गुण विशेषणों, को भी श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर स्वीकारोगे ही; शक्तिमत्ता का अर्थ होता है, कार्य विशेष की अनुगुणता, जो कि-कार्य विशेष में ही निरूपित होती है। कार्य विशेष के अप्रामाणिक हो जाने पर वह भी अप्रामाणिक हो जाती है। किंच-निर्विशेषवस्तुवादिनो वस्तुत्वमपिनिष्प्रमाणम् प्रत्यक्षानु- मानागमस्वानुभवाः सविशेषगोचरा इति पूर्वमेवोक्तम् । तस्मात् विचित्रचेतनाचेतनात्मकजगद्रूपेण “बहुस्याम्” इतीक्षणक्षमः पुरुषोत्तम एव जिज्ञास्य इति सिद्धम् । अधिक क्या-निर्विशेषवस्तुवादियों की वस्तु भी अप्रामाणिक है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और अनुभव सभी प्रमाणों से सगुण ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है, ऐसा पहिले भी कह चुके है। विचित्र जडचेतन जगत रूप से “अनेकहोने” का संकल्प करने वाला पुरुषोत्तम ही जिज्ञास्य ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होता है। ६ अधिकरण— एवं जिज्ञासितस्य ब्रह्मणश्चेतनभोग्यभूतजडरूपसत्त्वरजस्त- मोमयप्रधानाद् व्यावृत्तिरुक्ता, इदानीं कर्मवश्यात् त्रिगुणात्मक प्रकृतिसंसर्गनिमित्तनानाविधानन्तदुःखसागरनिमज्जनेनाशुद्धाच्छुद्धाच्च प्रत्यगात्मनोऽप्यखिलहेयप्रत्यनीकनिरतिशयानन्दं ब्रह्मेति प्रतिपाद्यते । ankurnagpal108@gmail.com
( ३०७ ) अब तक-चेतन भोग्य ,जडस्वभाव, सत्त्वरज तमोमय प्रधान से, पूर्वजिज्ञासित ब्रह्म की व्यावृत्ति (पृथकता) बतलाई गई । अब शुभाशुभ कर्मों से वशीभूत,त्रिगुणात्मक प्रकृति संबंध से अनेक प्रकार के दुःखों के सागर में निमग्न, बद्ध और मुक्त जीवों से, ब्रह्म की पृथकता, हेयगुण रहित और निरतिशय आनंद रूप से बतलाई जावेगी । आनन्दमयोऽभ्यासात् १।१।१३॥ तैत्तरीया अधीयते “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इति प्रकृत्य “तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरआत्मा आनंदमयः” इति । तत्र सन्देहः-किमयानंदमयोः बंधमोक्षभागिनः प्रत्यगा- त्मनो जीवशब्दाभिलपनीयादन्यः परमात्मा, उत स एव ? इति । तैत्तरीयोपनिषद् में “वह पुरुष अन्नरसमय है” ऐसा कहकर इस विज्ञानमय से भी सूक्ष्म एक दूसरा अन्तरात्मा आनंदमय है” ऐसा कहागया । इस पर संदेह होता है कि-यह आनंदमय कौन है ? बंधन मुक्ति वाला प्रत्यगात्मा जो कि जीव नाम से जाना जाता है, वह है अथवा उससे श्रेष्ठ परमात्मा है ? किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? “तस्यैष एव शारीर आत्मा” इत्यानन्दमयस्य शारीरत्वश्रवणात् । शारीरो हि शरीर संबंधी जीवात्मा एव । दोनों में कौन हो सकता है ? विचारने पर तो जीवात्मा ही प्रतीत होता है, क्योंकि-“वह शरीर धारक ही यह आत्मा है” इस वाक्य में आनंदमय के लिए शरीर कहा गया है । शरीर संबंधी जीवात्मा ही, निश्चित होता है । ननु च जगत कारणतया प्रतिपादितस्य ब्रह्मणः सुखप्रति- पत्त्यर्थमन्नमयादीननुक्रम्य तदेव जगत्कारणमानंदमय इत्युपदिशति, जगत्कारणं च “तदैक्षत” इतीक्षणश्रवणात् सर्वज्ञः सर्वेश्वरः इत्युक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com
( ३८८ ) (प्रतिवाद) नही; जगत कारण के रूप से प्रतिपादित ब्रह्म को सरलता पूर्वक जाना जा सके इसलिए अन्नमयादि रूपों से कहते हुए अंत में आनंदमय को ही जगत का कारण बतलाया गया और उसकी जगत् कारणता को, “उसने संकल्प किया” इस वाक्यगत ईक्षण क्रिया के आधार पर उसे सर्वज्ञ सर्वेश्वर बतलाते हुए सिद्ध किया गया है । सत्यमुक्तम्—स तु जीवान्नातिरिच्यते—“अनेन जीवेनात्मनाऽनु- प्रविश्य”—“तत्त्वमसि श्वेतकेतो” इति कारणतया निर्दिष्टस्य जीव सामानाधिकरण्यनिर्देशात् । सामानाधिकरण्यं हि एकत्वप्रति- पादनपरम् । यथा “सोऽयं देवदत्तः” इत्यादौ । ईक्षापूर्विका च सृष्टिश्चेतनस्य जीवस्योपपद्यत एव । अतः 'ब्रह्मविदाप्नोतिपरं” इति जीवस्याचित्संसर्गवियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतयोपदिश्यते । अचिद्वियुक्तस्वरूपस्य लक्षणमिदमुच्यते—“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति । तद्रूपप्राप्तिरेव हि मोक्षः । “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रिया- प्रियोरपहतिरस्ति, अशरीरंवाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । श्रतो जीवस्याविद्यावियुक्तं स्वरूपं प्राप्यतया प्रक्रान्तमानंदमय इत्युपदिश्यते । (वाद) आप तो ठीक कह रहे हैं—वह ब्रह्म जीव से भिन्न है कहाँ ? जैसा कि—“जीव ब्रह्म से स्वयं प्रविष्ट होकर” तथा “श्वेतकेतु तू वही है” इन वाक्यों में कारण रूप से निर्दिष्ट जीव रूप का सामाना- धिकरण्य दिखलाया गया है । अभिन्नता का प्रतिपादन ही सामानाधिरण्य है । जैसेकि “यह वही देवदत्त है” इत्यादि में सामानाधिकरण्य दिखलाया जाता है ईक्षा पूर्विका सृष्टि चैतन्य जीव की ही बतलाई गई है । “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” ऐसे जीव के, जडसंसर्ग रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाया गया है । जड संसर्ग रहित स्वरूप का लक्षण इस प्रकार बतलाया गया कि—“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” । वस्तुतः उस ब्रह्म के रूप की प्राप्ति ही तो मोक्ष है । जैसा कि इस वाक्य से स्पष्ट हो जाता है—‘शुभ और अशुभ जन्य पाप पुण्य, शरीर रहते हुए समाप्त ankurnagpal108@gmail.com
( ३०६ ) नही होते, शरीर रहित होने पर पाप पुण्य (जीव का) स्पर्श नहीं कर सकते।” इससे ज्ञात होता है कि-जीव के अविद्या रहित स्वरूप को प्राप्य बतलाते हुए उसे ही आनंदमय बतलाया गया है। तथा हि-शाखाचन्द्रन्यायेनात्मस्वरूपं दर्शयितुं “अन्नमयः पुरुषः” इति शरीरं प्रथमं निर्दिश्य तदन्तर्भूतं तस्य धारकं पञ्चवृत्तिप्राणं, तस्याप्यन्तर्भूतं मनः, तदन्तरभूतां च बुद्धिं, “प्राणमयो-मनोमयो-विज्ञानमयो” इति तत्र तत्र बुद्ध्यवतरणक्रमेण निर्दिश्य, सर्वान्तिर्भूतं जीवात्मानं “अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” इत्युपदिश्य अन्तरात्मपरम्परां समापयति । अतो जीवात्मस्वरूपमेव “ब्रह्मविदाप्नोति” इति प्रक्रान्तं ब्रह्म, तदेवानन्दमय इत्युपदिष्टमिति निश्चीयते । तथा शाखा चन्द्र न्याय से आत्मा के स्वरूप को बतलाने के लिए “अन्नमयः पुरुषः” कहकर सर्व प्रथम स्थूल शरीर को बतलाकर, उसके अन्तर्भूत, उसके धारक पंच प्रवृत्ति वाले प्राण प्राणके अन्तर्भूत मन और उसके अन्तर्भूत बुद्धि को “प्राणमय मनोमय विज्ञानमय” रूप से बुद्धि ग्राह्य कराते हुए, सबके अन्तर्भूत जीवात्मा को “अन्योऽन्तर आत्मा आनंदमयः” बतला कर अन्तरात्म परम्परा के उपदेश को समाप्त किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-जीवात्मा ही “ब्रह्मवेत्ता परता प्राप्त करता है” इस नियम के अनुसार, प्राप्य ब्रह्म है, उसे ही आनन्दमय रूप से बतलाया गया है। ननु च-“ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा” इत्यानन्दमयादन्यद्ब्रह्मेति प्रतीयते । नैवं-ब्रह्मैव स्वस्वभावविशेषेण, पुरुषविधत्वरूपितं शिरः पक्षपुच्छरूपेणाप्यपदिश्यते । यथा अन्नमयो देहोऽवयवी स्वस्माद- नतिरिक्तैः स्ववाक्यैरेव “तस्येदमेव शिरः” इत्यादिना शिरः-पक्ष-पुच्छ वत्तया निदर्शितः । तथा आनंदमयं ब्रह्मापि स्वस्मादनतिरिक्तैः प्रियादिभिर्निदर्शितम् । तत्रावयवत्वेन निरूपितानां प्रिय-मोद प्रमो- ankurnagpal108@gmail.com
-like curve, loop/turn, horizontal connector, and right vertical line!
Wait! Look at that character in line 25:
Does it have a left curve like स?
YES! Look at it:
It curves down-left, has a little diagonal down, a horizontal bar going to a vertical line!
WAIT! Is it स?
प र स?? No, with an ा matra: सा?? परसा? No!
Wait, what about त?
Wait, look at स in सत्य: स त् य.
What about स in सकल (line 19): स क ल.
Look at स in स्व (line 8): स व.
Look at स in से (line 8): स े.
Now look at the letter in line 25:
Left part: round, curves down, horizontal connector, vertical bar... wait, does it have ा? सा?
Wait, what Hindi word could परसा be? "परसा"? No, in Rajasthani/Braj "परस" = touch/sparsha, but this is modern standard Hindi!
Wait! Could it be परम?
Why would someone write `
( ३११ ) वाले अन्नमयादि वाक्य में, एक एक के अन्तरात्मा रूप से प्राणमय आदि को, आत्मा स्वरूप दिखला कर "इनसे भिन्न आत्मा अन्तर्यामी आनन्दमय है" उस आत्मा के निर्देश को आनंदमय में लाकर समाप्त किया गया है। इस से ज्ञान होता है कि-आत्म शब्द से निर्दिष्ट ब्रह्म नामवाला ही आनंदमय है। ननु च—"ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा "असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत् , अस्तिब्रह्मेति चेद्वेद, संतमेनं ततो विदुः" इति ब्रह्म ज्ञानाज्ञानाभ्यामात्मनः सद्भावासद्भावौ दर्शयति, नानंदमयज्ञानाज्ञानाभ्याम् । न चानंदमयस्य प्रियमोदादिरूपेण सर्व- लोकविदितस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्ता । अतो नानन्द- मयमधिकृत्यायं श्लोक उदाहृतः । तस्मादानंदमयादन्यद् ब्रह्म । (शंका की जाती है कि—) उक्त प्रसंग में "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" ऐसा कहने के बाद कहा गया कि—"ब्रह्म को यदि असत् कहते हो तो वह निश्चित ही असद् हो जावेगा, यदि उसे सद् कहते हो तो, इसे भी सत् ही मानों" इस श्रुति में— ब्रह्म ज्ञान और अज्ञान से, आत्मा का सद्भाव और असद्भाव दिखलाया गया है, आनंदमय के ज्ञान और अज्ञान की तो चर्चा भी नहीं है। आनंदमय की, प्रिय मोद आदि रूपों से, लोक प्रसिद्ध सद्भाव और असद्भाव ज्ञानवाली प्रतीकता, दिखलाई गई हो ऐसा भी नहीं कह सकते। इससे निश्चित होता है कि-यह श्लोक, आनंदमय के लिए नहीं कहा गया है। आनंदमय से भिन्न ब्रह्म के लिए ही कहा गया प्रतीत होता है, इसलिए आनंदमय से भिन्न ही ब्रह्म है। नैवम्—"इदं पुच्छं प्रतिष्ठा"—पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा—"अथर्वां- गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा"—"महः पुच्छं प्रतिष्ठा" इत्युक्त्वा तत्रतत्रो- दाहृताः। "अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायंते" इत्यादिश्लोकाः यथा न पुच्छमात्रप्रतिपादनपराः, अपि तु अन्नमयादिपुरुष प्रतिपादनपराः; एवमत्रापि आनन्दमयस्यायं "असन्नेव" इतिश्लोकः। नानन्दमय- व्यतिरिक्तस्य पुच्छस्य। आनंदमयस्यैव ब्रह्मत्वेऽपि प्रियमोदादिरूपेण रूपितस्यापरिच्छिन्नानंदस्य सद्भावासद्भावज्ञानाशंका युक्तैव।
( ३१२ ) (समाधान) बात ऐसी नही है- उसी श्रुति में आगे चल कर “यह पुच्छ बसने का आधार है, पृथिवी मे भी वही आधार है, आगिरस गोत्रीय अथर्ववेद के मत्रद्रष्टा मे वही आधार है, तथा बुद्धिगत चिदाभास मे भी वह आधार है” ऐसा कहते हुए, उदाहरण प्रस्तुत किये गए है । ‘अन्नाद वै प्रजाः प्रजायते’’ इत्यादि श्लोक जैसे केवल पुच्छ मात्र के प्रतिपादक नही हैं अपितु अन्नमयादि पुरुष के प्रतिपादक है, वैसे ही आनंदमय के प्रकरण में भी “असन्न एव” इत्यादि श्लोक आनंदमय पुरुष का प्रति- पादक है, अन्य पुच्छ का प्रतिपादक नही है । आनंदमय मे ब्रह्मत्व होते हुए भी, प्रिय, मोद आदि रूपों से रूपित अपरिच्छिन्न आनंद की सद्भाव और असद्भाव सबंधी आशंका युक्ति युक्त ही है । पुच्छब्रह्मणोऽप्यपरिच्छिन्नानंदतयैव हि अप्रसिद्धता । शिरः प्रभृत्यवयववित्वाभावादब्रह्मणो नानंदमयो ब्रह्मेति चेत्-ब्रह्मणः पुच्छ्त्वप्रतिष्ठात्वाभावात् पुच्छमपि ब्रह्म न भवेत् । अथाविद्यापरि- कल्पितस्य वस्तुनस्तस्याश्रयभूतत्वात् ब्रह्मणः पुच्छं ऽप्रतिष्ठेति रूपण- मात्रमित्युच्येत, हन्त र्तहि तस्यासुखाद्व्यावृत्तस्यानंदमयस्य ब्रह्मणः प्रियशिरस्त्वादिरूपणं भविष्यति । एवं च “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” इति विकारास्पदजऽपरिच्छिन्नवस्वंतरव्यावृत्तस्यासुखाद्व्यावृत्ति- रानन्दमय इत्युपदिश्यते । ततश्चाखण्डैकरसानन्दरूपे ब्रह्मण्यानंदमय इति मयट् प्राणमय इव स्वार्थिको दृष्टव्यः। तस्मादविद्यापरिकल्पित- विविधविचित्रदेवादिभेदभिन्नस्य जीवात्मनः स्वाभाविकं रूपम् खंडैकरसं सुखैकतानमानंदमय इत्युच्यत इत्यानंदमयः प्रत्यगात्मा । पुच्छ ब्रह्म की अपरिच्छिन्न आनंद रूप से प्रसिद्धि नही है । यदि कहा जाय कि- शिर इत्यादि अवयवो के अभाव से ब्रह्म, 'आनंदमय ब्रह्म,' नही हो सकता । तब तो ब्रह्म में पुच्छत्व के अभाव होने से, पुच्छ ब्रह्म भी, ब्रह्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि-अविद्या परिकल्पित वस्तु के आश्रयभूत होने से ब्रह्म की "पुच्छ प्रतिष्ठा" इस रूपक से वर्णन किया गया है-(ब्रह्म के अवयव वास्तविक नहीं हैं) तब तो-दुःख रहित ankurnagpal108@gmail.com
( ३१३ ) आनंदमय ब्रह्म के, प्रिय-शिर आदि अवयव भी रूपक ही हो जायेंगे। इसी प्रकार "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इस वाक्य में, विकारास्पद जड परिच्छिन्न पदार्थ से पृथक्, परिष्कृत सुख से पूर्ण आनंदमय का उपदेश दिया गया है। तथा अखण्डैकरस आनंदरूप ब्रह्म में प्रयुक्त आनंदमय शब्द में जो मयट् प्रत्यय है वह, प्राणमय की तरह, स्वार्थिक जानना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि-अविद्या परिकल्पित, विविध विचित्र देवादि भेदों वाले जीवात्मा की स्वाभाविक अखण्डैकरस रूप की सुखैकतानता को ही "आनन्दमय" नाम से बतलाया गया है, इसलिए जीवात्मा ही आनंदमय है। एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-आनंदमयोऽभ्यासात्-आनंदमयः परमात्मा कुतः ? अभ्यासात् । "सैषाऽनंदस्य मीमांसा भवति" इत्यारभ्य 'यतोवाचोनिवर्त्तन्ते" इत्येवमंतेन वाक्येन शतगुणितोत्तरक्रमेण निरतिशयदशाशिरस्कोऽभ्यस्यमान आनंदः अनंतदुःखमिश्रपरिमित- सुखलवभागिनि जीवात्मनि असंभवन् निखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानसकलेतरविलक्षणं परमात्मानमेव स्वाश्रयमावेदयति । सिद्धान्तः-इस प्रकार के विचार के समक्ष आने पर अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं- "आनंदमयोऽभ्यासात्" अर्थात् आनंदमय परमात्मा ही है, क्यों कि-शास्त्र में उसके लिए ही पुनः पुनः आनंदमय शब्द का प्रयोग किया गया है। "सैषा आनंदस्य मीमांसा भवति" से प्रारंभ कर "यतो वाचो निवर्त्तन्ते" इस अंतिम वाक्य तक शतगुणितोत्तर क्रम से जिस निरतिशय श्रेष्ठतम मूर्धन्यदशा को बार बार आनंद नाम से कहा गया है वह, अनंत दुःख संवलित, परिमित लवमात्र सुख को प्राप्त करने वाले जीवात्मा में नितान्त असंभव है। वह तो समस्त हीन दोषों से रहित कल्याणैकतान समस्त अन्यान्य पदार्थों से विलक्षण परमात्मा में ही संभव है, आनंद का एकमात्र आश्रय परमात्मा ही है। यथाह-"तस्माद्वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तरात्मा आनंदमयः" इति विज्ञानमयो हि जीवः, न बुद्धिमात्रम्, मयट् प्रत्ययेन व्यतिरेकप्रतीतेः । प्राणमयेत्यवगत्वा स्वार्थीयकताऽश्रीयते । ankurnagpal108@gmail.com
( ३१४ )
इह तु तद्वतो जीवस्य संभवान्नानर्थक्य न्याय्यम् । बद्धो मुक्तश्च प्रत्यगात्मा ज्ञातैवेत्यभ्यधिष्महि । प्राणमयादौ च मयडर्थसंभवो ऽनन्तरमेव वक्ष्यते । कथं तर्हि विज्ञानमयविषयश्लोके “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति केवल विज्ञानशब्दोपादानं उपपद्यते । ज्ञातुरेवाऽत्मनः स्वरूपमपि स्व प्रकाशतया विज्ञानमित्युच्यत इति न दोषः, ज्ञानैक- निरूपणीयत्वाच्च ज्ञातुःस्वरूपस्य स्वरूपनिरूपणधर्मशब्दा हि धर्म- मुखेन धर्मिस्वरूपमपि प्रतिपादयन्ति गवादिशब्दवत् ।
जैसा कि-उसी आनंद तत्त्व के व्याख्यान के प्रसग मे कहा गया कि-“विज्ञानमय से भिन्न उसका अंतरात्मा अ'नदमय है” इसमे विज्ञान मय का तात्पर्य जीवात्मा है, केवल बुद्धि ही नही है, मयट् प्रत्यय से ही जीवात्मा और बुद्धि की पृथकता होती है (अर्थात् केवल विज्ञान शब्द बुद्धिवाचक है, मयट् प्रत्यय युक्त विज्ञानमय शब्द जीव वाचक है) प्राणमय शब्द में शब्द के अर्थ की कोई दूसरी गति नही है, इसलिए वहाँ उसका विकारार्थ ही ग्राह्य होगा (प्राण बहुलता ऐसा अर्थ हो नहीं सकता) विज्ञानमय शब्द मे तो, जीव मे विज्ञानवत्ता संभव है, इसलिए मयट् का विकारार्थ करना अनर्थ होगा। बद्ध एवं मुक्त जीवात्मा मे जो ज्ञातापन है, विज्ञानमय शब्द, उसी का द्योतक है। प्राणमय आदि शब्दों में मयट् का प्राचुर्यार्थ घटाना असंभव है, ऐसा अन्यत्र कहते हैं ।
(शंका) यदि ऐसा है तो-विज्ञानमय संबंधी श्लोक में “विज्ञान ही यज्ञ का विस्तार करता है” ऐसा, केवल विज्ञान शब्द का ही उपादान क्यों किया गया है ? (समाधान) इससे कोई अन्तर नहीं आता, क्यों कि- विज्ञाता आत्मा का स्वरूप स्वप्रकाश है, इसलिए उसे केवल “विज्ञान शब्द से भी बतला दिया गया। ज्ञाता का स्वरूप ज्ञान द्वारा ही निरूपित हो सकता है। धर्मों के स्वरूप के निरूपक शब्द, जो कि-उसके धर्म का बोध कराते है वह गौ शब्द की तरह हैं, अर्थात् सास्नालांगूलककुदखुर- विषाण आदि चिन्हों को धारण करने वाला जो जीव है उसे गौ कहते हैं, इसी तरह विज्ञान शब्द ‘ज्ञान को धारण करने वाला जीवात्मा है’ इस तथ्य का निरूपण करता है ।
( ३१५ ) “कृत्यल्युटो बहुलम्” इति वा कर्त्तरिल्युडाश्रीयते । नंद्यादित्वं वाऽश्रित्य “नंदिग्रहि” इत्यादिना कर्त्तरि ल्युः । अतएव च “विज्ञानं यज्ञं तनुते” कर्माणि तनुतेऽपि च ‘ इति यज्ञादि कर्त्तृत्वं विज्ञानस्य श्रूयते । बुद्धिमात्रस्य हि न कर्त्तृत्वं संभवति । अचेतनेषु हि चेतनोप- करणभूतेषु विज्ञानमयात् प्राचीनेष्वन्नमयादिषु न चेतनधर्मभूतं कर्त्तृत्वं श्रूयते । अतएव च चेतनमचेतनंच स्वासाधारणैः निलयनत्वा- निलयत्वादिभिर्धर्मविशेषैर्विभज्य निर्दिशद्वाक्यं “विज्ञानं चाविज्ञानं च” इति विज्ञान शब्देन तद्गुणं चेतनं वदति । व्याकरणीय “कृत्यल्युटोबहुलम्” इस नियम से कर्त्तृवाच्य में ल्युट प्रत्यय के आश्रय से, तथा नंद्यादि धातुओं के पाठ में ज्ञा धातु के पाठ होने से “नंदिग्रहि” इत्यादि व्याकरणीय नियम से कर्त्तृवाच्य में “ल्यु” प्रत्यय करके तथा व्याकरणीय नियम से ल्यु को अन् प्रत्यय करने से ज्ञान शब्द निष्पन्न होता है । इसीलिए “विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च” इस वाक्य में यज्ञादिकर्म का कर्त्तृत्व विज्ञान का बतलाया गया । केवल बुद्धि में तो कर्त्तृत्व संभव है नहीं । उक्त प्रसंग में विज्ञानमय के पूर्ववर्त्ती अन्नमय आदि में तो चेतन धर्म की कोई चर्चा ही नहीं है। जो कि, चेतन के उपकरण स्वरूप हैं। विज्ञान शब्द का चेतन अर्थ करने के लिए ही, निलयता (विश्वाधारत) अनिलयता आदि असाधारण स्वीय धर्म विशेष द्वारा विभक्त, चेतन और अचेतन, के निर्देशक “विज्ञानं चाविज्ञानं” वाक्य में, विज्ञान शब्द से, विज्ञान गुणसंपन्न चेतन को बतलाया गया है । तथाऽन्तर्यामि ब्राह्मणे ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यस्य काण्व- पाठगतस्य पर्यायस्य स्थाने ‘य आत्मनि तिष्ठन्” इति पर्यायम धीयाना माध्यन्दिनः काण्वपाठगतं विज्ञानशब्द निर्दिष्टं जीवात्मेति स्फुटीकुर्वन्ति । विज्ञानं इति च नपुंसकलिंगं वस्तुत्वा- भिप्रायं, तदेवं विज्ञानमयात् जीवात् अन्यस्तदन्तरः परमात्मा आनंदमयः ।
३. द्वितीयाध्याय: अविरोधाध्याय (प्रधान, परमाणु, शून्यवाद खण्डन व जीव-ब्रह्म सम्बन्ध)
( ३१६ ) तथा इसी प्रकार काण्वशाखोक्त अन्तर्यामी ब्राह्मण के “जो विज्ञान में अवस्थान करता है” इस वाक्य में जिसे “विज्ञान” शब्द से निर्देश किया गया है, उसे ही माध्यन्दिन शाखीय “जो आत्मा में अवस्थान करता है” इस वाक्य में “आत्मा” शब्द से बतलाया गया, इस प्रकार विज्ञान का पर्यायवाची शब्द आत्मा सिद्ध होता है जिससे विज्ञान का अर्थ जीवात्मा सुस्पष्ट है । विज्ञान शब्द का जो नपुंसक लिंग में प्रयोग किया गया है, वह वस्तुत्व का बोधक है । इससे निर्णय होता है कि— विज्ञानमय जीव से अतिरिक्त कोई विज्ञानमय का अन्तरात्मा परमात्मा आनंदमय है । यद्यपि “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति श्लोके ज्ञानमात्रमेवोपादी- यते, न ज्ञाता, तथाऽपि “अन्योन्तरात्मा विज्ञानमयः” इतितद्वान् ज्ञातैवोपदिश्यते, यथा— “अन्नाद् वैः प्रजाः प्रजायंते” इत्यत्र श्लोके केवलान्तोपादानेऽपि “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इत्यत्र नान्नमात्रं निर्दिष्टम्, अपि तु तन्मयः तद्विकारः । एतत् सर्वं हृदि निधाय सूत्र- कारः स्वयमेव “भेदव्यपदेशात्” इत्यनन्तरमेव वदति । यद्यपि-- विज्ञान यज्ञ का विस्तार करता है” इस वाक्य में ज्ञान मात्र का ही उपादान किया गया है, ज्ञाता का नहीं, फिर भी “भिन्न ही कोई अन्तरात्मा है, जो कि विज्ञानमय है” इस वाक्य में विज्ञानमय ज्ञाता (जीव) का ही निर्देश किया गया है । जैसे कि--“अन्न से ही प्रजा का जन्म होता है’ इस श्लोक में केवल अन्न को उपादान बतलाया गया है तथा “वही यह पुरुष अन्नरसमय है” इस वाक्य में अन्नमय के विकृतदेह का उल्लेख किया गया है । इन सभी बातों को हृदयंगम करके सूत्रकार ने स्वयं ही “भेदव्यपदेशात्” सूत्र में जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता स्पष्ट बतला दी है । यदुक्तं जगत्कारणतया निर्दिष्टस्य “अनेनेजीवेनात्मनाऽनु-
- प्रविश्य “तत्वमसि” इति च जीवसामानाधिकरण्यनिर्देशाज्जगत् कारणमपि जीवस्वरूपान्नातिरिच्यत इति कृत्वा जीवस्यैव स्वरूपं “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” इति प्रक्रान्तमसुखाद्व्यावृत्तत्वेनानंदमय ankurnagpal108@gmail.com
( ३१७ ) इत्युपदिश्यत इति तदयुक्तम्, जीवस्य चेतनत्वे सत्यपि "तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्" इतिस्वसंकल्पपूर्वकानन्तविचित्र सृष्टियोगानुपपत्तेः । शुद्धावस्थस्यापि हि तस्य सर्गादिजगद्व्यापार- संभवो-"जगद्व्यापारवर्जम्" भोगमात्रसाम्यलिंगात्" इत्यत्रोपपा- दयिष्यते । जो यह कहते हैं कि—जगत कारण रूप से निर्दिष्ट "मैं ही जीव रूप से इसमें प्रवेशकर" तथा "तू वही है" इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा और परमात्मा का जो सामानाधिकरण्य अभेद संबंध बतलाया गया है, वह-जीव के अतिरिक्त परमात्मा कोई अन्य वस्तु नहीं है, ऐसा बतलाता है तथा जीव के ही स्वरूप को 'ब्रह्मवेत्ता परतत्त्व को पा जाता है" इस वाक्य में, परतत्त्वता को प्राप्त, दुःख से अनावृत आनंदमय कहा गया है । सो आपका यह कथन भी असंगत है--क्योंकि—"उसने विचार किया कि बहुत होकर प्रकट होऊँ" उसने तेज की सृष्टि की "इत्यादि वाक्यों में जिस स्वसंकल्पात्मिका विविधरूपा सृष्टि का वर्णन किया गया है, वह चेतनता होते हुए भी, जीव के सामर्थ्य के बाहर की बात है ।' विशुद्धावस्थापन्न जीव से भी ऐसी जागतिक सृष्टि संभव नहीं है । ऐसा ही—सूत्रकार—"जगद्व्यापारवर्जम् "तथा" भोगमात्र साम्यलिंगाच्च" सूत्रों में बतलाते हैं । कारणभूतस्य ब्रह्मणो जीवस्वरूपत्वानभ्युपगमे "अनेन जीवेना- त्मना" तत्त्वमसीति सामानाधिकरण्यनिर्देशः कथमुपपद्यत इति चेत्—कथं वा निरस्तनिखिलदोषगंधस्य सत्य- संकल्पस्य सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रनवधिकातिशया संख्येयकल्याणगुणगणस्य सकलकारणभूतस्यब्रह्मणः नानाविधानन्तदुःखाकरकर्माधीन चिन्तितनिमिषितादिसकलप्रवृत्तिजीवस्वरूपत्वम् ? अन्यतरस्य मिथ्यात्वेनोपपद्यत इति चेत्, कस्य भोः ? किं हेयसंबन्धस्य ? किं वा हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानस्वभावस्य हेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानस्य ब्रह्मणोऽनाद्यविद्याश्रयत्वेन हेयसंबंध मिथ्याप्रति- ankurnagpal108@gmail.com
( ३१८ )
भासो मिथ्या रूप इति चेत्, विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते, ब्रह्मणो हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानत्वमनाद्यविद्याश्रयत्वेनानंतदुःखविषय मिथ्या- प्रतिभासाश्रयत्वं चेति । अविद्याश्रयत्वं तत्कार्यदुःखप्रति- भासाश्रयत्वं चैव हि हेय संबंधः । तत्संबन्धित्वं प्रत्यनीकत्वं च विरुद्धमेव । तथाऽपि तस्य मिथ्यात्वान्न विरोध इति मा वोचः । मिथ्याभूतमप्यपुरुषार्थ एव तन्निरसनाय सर्वेवेदांता आरभ्यंत इति ब्रूषे । निरसनीयापुरुषार्थयोगश्च हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानतया विरुध्यते । यदि आप पूछें कि—कारणभूत ब्रह्म की जीवस्वरूपता न मानने से "अनेन जीवेन" तथा "तत्त्वमसि" आदि वाक्यों से सम्मत सामाना- धिकरण रूप अद्वैत की बात कैसे बनेगी ? मैं पूछता हूं कि—समस्त दोषों से रहित, सत्य संकल्प, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, अनंत अपार असंख्य कल्याण गुणैकराशि, सभी के एकमात्र कारण ब्रह्म की, अनेक दुःखों की खान, कर्माधीन, चिन्तित, क्षणभंगुर प्रवृत्तिवाली जीव स्वरूपता कैसे संभव होगी ? आप कहें कि—जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता, मिथ्यात्व आभास मात्र है । तो वह मिथ्यात्व आप किसका मानते हैं ? जीवात्मा के हेयगुण संबंधों का, अथवा हेयगुणों के प्रतिपक्षी कल्याणगुण समन्वित परमात्मा के स्वभाव का ? यदि, हेयता रहित कल्याणैकतान ब्रह्म का, अनादि अविद्या के आश्रय से, हेय संबंध मिथ्या प्रतिभास है, तो एक ही ब्रह्म में, हीनता रहित कल्याणगुणैकतानता और अनादि अविद्याश्रित अनंत दुःखों का विषयता संबंधी मिथ्या प्रतिभासाश्रय, ये दोनों परस्पर विरोधी बातें कैसे संभव हैं ? अविद्या की आश्रयता, तथा उससे संभूत दुःख प्रतिभासाश्रयी हेयगुण संबंध, और ब्रह्म संबंधी हेयगुण प्रतिपक्षता, ये दोनों बातें विरुद्ध ही तो हैं । इस पर भी मिथ्याभास का आश्रय लेकर यह मत कहो कि—विरुद्धता नहीं होगी । मिथ्या होते हुए भी वह त्याज्य है, उसको हटाने के लिए सारे ही वेदांत वाक्य उपदेश देते हैं, ऐसा भी तुम्हीं स्वीकारते हो [अर्थात् मिथ्यात्व को, हेय और त्याज्य मानते हो तो उसे मिथ्याभास कैसे कह सकते हो ?] जिस वस्तु को त्याज्य मानते
( ३१६ ) हैं, वह हेय प्रतिपक्षी कल्याणैकतान गुणों से विरुद्ध ही है, तभी तो त्याज्य है। किं कुर्मः ? “येनाश्रुतं श्रुतं भवति” इत्येकविज्ञानेन सर्व- विज्ञानं प्रतिज्ञाय “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिना निखिल- जगदेककारणतां, “तदैक्षत बहुस्याम्” इति सत्यसंकल्पतां च ब्रह्मणः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये नानंतदुःखाश्रयजीवैक्यं प्रतिपादितम्, तदन्यथानुपपत्त्या ब्रह्मण एवाविद्याश्रयत्वादि परि- कल्पनीयमिति चेत् । विवश होकर यदि कहो कि क्या करे ? “जिसके द्वारा अश्रुत भी श्रुत होता है” इस वाक्य से एक विज्ञान से समस्त विज्ञान की बात को बतलाकर “हे सौम्य यह सारा जगत् सन् ही था” इत्यादि वाक्य से ब्रह्म की सर्व जगत्कारणता मानकर “उसने विचार किया कि बहुत हो जाऊँ” इस वाक्य से ब्रह्म की सत्य संकल्पता का भी प्रतिपादन करके, उसी ब्रह्म की “तू वही है” इस वाक्य द्वारा अनंत दुःखाश्रयी जीव की सामानाधिकरण्य रूप एकता प्रतिपादित की गई है, इसलिए अगत्या हमें, ब्रह्म की परस्पर विरोधी असंगत ( बद्धता और मुक्तता ) बातों के परिहार के लिए, ब्रह्म मे ही अविद्याश्रयत्व आदि की परिकल्पना करनी पडती है । श्रुतोपपत्तयेऽप्यनुपपन्नं विरुद्धं च न कल्पनीयम् अथ हेय संबंध एव पारमार्थिकः, कल्याणैकस्वभावता तु मिथ्याभूता, हन्तैवं, तापत्रयाभिहतचेतनोज्जिजीविषया प्रवृत्तं शास्त्रं, तापत्रया- भिहतिरेव तस्य पारमार्थिकी, कल्याणैकस्वभावस्तु भ्रांतिपरि- कल्पित इति बोधयत् सम्यगुज्जीवयति । अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ब्रह्मणो निर्विशेषचिन्मात्रस्वरूपातिरिक्तजीवत्व दुःखित्वादिकं सत्यसंकल्पत्वकल्याणगुणाकरत्वाद्यपि मिथ्याभूतं कल्पनीयमिति चेत्; अहो भवतां वाक्यार्थपर्यालोचनकुशलता । एक विज्ञानेन सर्व- विज्ञानप्रतिज्ञान सवस्य मिथ्यात्वे सर्वस्य ज्ञातव्यस्याभावान्न ankurnagpal108@gmail.com
( ३२० ) सेत्स्यति। यद्येकविज्ञानं परमार्थविषयम्, तच्चैव सर्वविज्ञानमपि यदि परमार्थविषयम् तदन्तर्गतं च तदा तत् ज्ञानेन सर्वविज्ञानमिति- शक्यते वक्तुम् न हि परमार्थशुक्तिका ज्ञानेन तदाश्रयमपरमार्थं रजतं ज्ञातं भवति । ( विवाद ) ऐसी शास्त्र विरुद्ध और युक्ति विरुद्ध कल्पना करना ठीक नहीं है। यदि हेयगुण संबंध को परमार्थिक तथा कल्याणैकतान स्वभावता को अपारमार्थिक मान लेंगे तो, त्रितापतापित चेतन जीवों की शांति के लिए जो उपाय शास्त्रों में बतलाए गए हैं, उनका क्या समाधान होगा ? क्या तापत्रयाभिहति को ही पारमार्थिक तथा कल्याण स्वभाव वस्तु को भ्रांति कल्पित मानना उचित होगा ? यदि उक्त दोष के परिहार के लिए, ब्रह्म के निर्विशेष चैतन्य स्वरूप के विरोधी जीवत्व, दुःखित्व आदि धर्म तथा सत्यसंकल्पत्व, कल्याणगुणाकरत्व, जगत्कारणत्व आदि सभी मिथ्या हैं, ऐसी परिकल्पना करते हैं, तो आपकी वाक्यपर्या- लोचना के कौशल की बलिहारी है। वाह, समस्त वस्तु के मिथ्या हो जाने पर कोई ज्ञातव्य विषय ही न रह जायगा, तथा एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है, यह नियम भी व्यर्थ हो जायगा । जब एक वस्तु संबंधी ज्ञान परमार्थ विषयक होगा तभी, समस्त विषयक ज्ञान पारमार्थिक हो सकता है तभी यह नियम लागू हो सकेगा कि—एक की जानकारी से समस्त की जानकारी होती है। अन्यथा, सीप का सही ज्ञान और चांदी संबंधी ज्ञान जो कि सीप नहीं है तथा सीप के समान सही भी नहीं है, उन दोनों को एक मानना पड़ेगा। पारमार्थिक सीप संबंधी ज्ञान से, सीप के आश्रित अपारमार्थिक रजत, की प्रतीति नहीं हो सकती । अथोच्येत — एक विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाः, अयमर्थः “निर्विशेषवस्तु मात्रमेव सत्यम्” इति । न तर्हि “येन अश्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतम्, अविज्ञातं विज्ञातं” इति श्रूयेत् । येन श्रुतेन अश्रुतमपि श्रुतं भवतीत हि अस्य वाक्यस्यार्थः । कारणतयोपल- क्षितनिर्विशेषवस्तुमात्रस्यैव सद्भावश्चेत्प्रतिज्ञातः “यथा सौम्येकेन ankurnagpal108@gmail.com
( ३२१ ) मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातम्” इति दृष्टान्तोऽपि न घटते । मृत्पिण्ड विज्ञानेन हि तद्विकारस्य ज्ञातता निदर्शिता । तत्रापि विकारस्यासत्यताऽभिप्रेतेति चेत्, मृद्विकारस्य रज्जुसर्पादिवद- सत्यत्वं शुश्रूषोरसिद्धमिति प्रतिज्ञातार्थ संभावना प्रदर्शनाय “यथा सोम्य” इति प्रसिद्धवदुपन्यासो न युज्यते । न च तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्यज्ञानोत्पत्तेः प्राग्विकारजातस्य असत्यतामापादयत् तर्कानु- गृहीतं वा प्रमाणमुपलभामह इति । अयमर्थः “तदन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्य” इत्यत्र वक्ष्यते । जो यह कहो कि—एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा का तात्पर्य है कि “निर्विशेष वस्तु मात्र ही सत्य है ।” सो यह कथन भी ठीक न होगा ।” जिससे अश्रुत श्रुत-अमत, मत तथा अज्ञात, ज्ञात होता है” इस वाक्य का सही अर्थ यह है कि—जिससे अश्रुत पदार्थ भी परिश्रुत होता है । यदि, एकमात्र कारणताविशिष्ट को ही शास्त्र में सत्य माना गया होता तो, “सोम्य ! एक मृत्पिण्ड से सारे मृण्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है” यह दृष्टान्त संगत नहीं हो सकता । इस उदाहरण में मृत्पिण्ड से विकारता दिखलाई गई है । इस पर भी कहें कि—यहाँ भी, विकार की असत्यता ही कही गई है, तो भी मिट्टी के निर्मित घड़े आदि, रस्सी में सर्प की भ्रान्ति की तरह, असत्य तो प्रतीत होते नहीं । अनुभूत पदार्थ की सत्यता के प्रतिपादन की संभावना मात्र के लिए ही केवल, “हे सौम्य !” इत्यादि वाक्य में प्रसिद्ध नियम का व्याख्यान किया गया हो, ऐसा समझ में नहीं आता । न “तत्त्वमसि” आदि वाक्यजन्य ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व का कोई ऐसा तर्कानुमोदित प्रामाणिक वाक्य ही मिलता है, जिससे विकृत पदार्थों की असत्यता सिद्ध हो सके । इस सारे तात्पर्य को सूत्रकार—तदन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ सूत्र में बतलाते हैं । तथा—“सदेवसोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयं”तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति, तत्तेजोऽसृजत्”—“हन्त इमास्तिस्रो देवता, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—“सन्मूलाः सौम्येमाः ankurnagpal108@gmail.com
( ३२२ ) सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः...—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" इत्यादिना अस्य जगतः सदात्मकता, सृष्टे पूर्वकाले नामरूप विभागप्रहाणम्, जगदुत्पत्तौ सच्छब्दवाच्यस्यब्रह्मणः, स्वव्यतिरिक्त- निमित्तान्तरा म पे क्ष त्वं सृष्टिकाले अहमेव अनंतस्थिरत्रसरूपेण “बहुस्याम्” इति अनन्यसाधारणसंकल्पविशेषः, यथा संकल्पमनंत विचित्र तत्त्वानां विलक्षणक्रमविशेषविशिष्टासृष्टि. समस्तेषु अचेतनेषुवस्तुषु स्वात्मकजीवानुप्रवेशेनैवानंतनामरूपव्याकरणं, स्व- व्यतिरिक्तस्य समस्तस्य स्वमूलत्वम्, स्वायत्ततत्वं, स्वप्रवर्त्त्यत्वं, स्वेनैव जीवनम्, स्वप्रतिष्ठत्वमित्याद्यनंतविशेषाः शास्त्रैकसमधिगम्याः प्रतिपादिताः । तत्संबंधितया प्रकरणान्तरेष्वप्यपहतपाप्मत्वा- दिनिरस्तनिखिलदोषतासर्वज्ञतासर्वेश्वरत्वसत्यकामत्वसत्य
( ३२३ ) विलीन हो जाती है"—यह सारा ही जगत ब्रह्मात्मक है।" इत्यादि शास्त्र वाक्यों में, जगत की सदात्मकता, सृष्टि के पूर्व नाम रूप विभाग का निराकरण, तथा सृष्टि कालिक अनंत स्थावर जंगम रूपों में व्यक्त होने का ब्रह्म का अनन्य असाधारण संकल्प विशेष, संकल्पानुरूप विलक्षण क्रम विशेष, विचित्र विशिष्ट सृष्टि रचना, एवं समस्त अचेतन वस्तुओं में जीवरूप से प्रवेश कर नाम रूप व्याकृति, अपने में ही समस्त जीवों की लीनता, इत्यादि ब्रह्म की अनंत विशेषताओं का प्रतिपादन किया गया है। उन्हीं विशेषताओं से संबंधित अन्य प्रकरणों में भी, निष्पापता, निर्दोषता, सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सत्यकामता, सत्यसंकल्पना, सर्वानंद- कारिता, अत्यानंदमयता, इत्यादि अनेक प्रामाणिक सहस्रों विशेषताओं का भी प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार असाधारण अगोचर, अनंत विशेषण विशिष्ट ज्ञेय ब्रह्म के बोधक "तत्" शब्द की निर्विशेष (सामान्य) वस्तुओं से समता नितान्त असंगत प्रतीत होनी है, यह तो प्रमत्तों का सा प्रलाप है। "त्वं" पद संसारी विशिष्ट जीवात्मा का बोधक है उसकी भी यदि निर्विशेष ( सामान्य ) रूप से कल्पना की जाय तो, "त्वं" पद के वास्तविक अर्थ का गला घोटना मात्र है। वह निर्विशेष प्रकाशस्वरूप वस्तु अविद्या से आवृत हो जाती है इसलिए उसके वास्तविक स्वरूप का नाश हो जाता है; यह संभावना भी असंभव है, ऐसा पहिले ही कह चुका हूँ। यदि ऐसा मान लेंगे तो, सामानाधिकरण्य बोध्य तत् त्वं दोनों ही पदों के मुख्यार्थ का त्याग करके लक्षणा का आश्रय लेना पड़ेगा। अथोच्येत—सामानाधिकरण्यवृत्तानामेकार्थप्रतिपादनपरतया विशेषणांशे तात्पर्या संभवादेव विशेषणनिवृत्तेर्वस्तुमात्रैकत्वप्रति- पादनान्नलक्षणा प्रसंगः । यथा “नीलमुत्पलम्” इति पदद्वयस्य विशेष्यैकत्वप्रतिपादनपरत्वेन नीलत्वोत्पलत्वस्वरूपविशेषणद्वयं न विवक्ष्यते । तद्विवक्षायां हि नीलत्वविशिष्टाकारेणोत्पलत्व- विशिष्टाकारस्यैकत्वप्रतिपादनं प्रसज्यते । तत्तु न संभवति न हि नैल्यविशिष्टाकारेण तद्वस्तूतपलपदेन विशेष्यते, जातिगुणयोरन्योन्य समवायप्रसंगात् । अतो नीलत्वोत्पलक्षितवस्त्वेकत्वमात्रं सामाना-