श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०३ ) इतश्च न प्रधान प्रधान को कारण मानना इसलिए भी कठिन है कि- श्रुतत्वाच्च १।१।१२॥ श्रुतमेव हि अस्यामुपनिषदि अस्य सच्छब्दवाच्यस्य आत्मत्वेन, नामरूपयोर्व्याकर्त्तृत्वं,सर्वज्ञत्वं,सर्वशक्तित्वं,सर्वाधारत्वं अपहतपाप्म- त्वादिकं, सत्यकामत्वं, सत्यसंकल्पत्वं च-“अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”-सन्मूलाःसौम्येमाःसर्वाःप्रजाःसदायतनाःसत्प्र- तिष्ठाः-“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा”यच्चास्येहास्ति- यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितम् तस्मिन् कामान्त्समाहिताः- “एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः” इति । इस उपनिषद् में,इस सत् शब्द वाच्य की,आत्मारूप से नाम और रूप की व्याकृति, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिसंपन्नता, सर्वाधारकता, निर्दोषता, निष्पापता, सत्यकामता सत्यसंकल्पता आदि स्पष्टतः बतलाई गई है-जैसे- “इसमें जीवात्मारूप से प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा”- “सत् ही इस प्रजा का मूल आश्रय और प्रतिष्ठा है”-“सारी वस्तुएं सदात्मक ही है,वही सत्य और आत्मा है”-“इस जगत में जो कुछ भी विद्यमान है,या जो कुछ नहीं( अतीत)है,वह सब परमात्मा में ही समाहित (लीन)है,संपूर्ण कामनायें और अभिलाषायें भी उन्हीं में प्रविष्ट हैं”- “यह आत्मा निष्पाप,जरा मृत्यु शोक तथा भूख प्यास रहित,सत्य काम और सत्यसंकल्प है” तथा च श्रुत्यंतराणि-“ न तस्यकश्चित् पतिरस्य लोके न चेशिता नैव च तस्य लिंगम्, स कारणंकरणाधिपाधिपो न चास्य कश्चित् जनिता न चाधिपः”-“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानिकृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”-“अन्तःप्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वा