श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०२ ) इसकी इन्द्रियां अपने आश्रय स्थान में यथावत स्थित हो जाती हैं।" और जागने पर—“व्याघ्र-सिंह-वराह-मशक-दंश-जो कुछ भी हैं वे जैसे सुषुप्ति के प्रथम प्रतीत होते थे वैसे ही प्रतीत होते हैं।" सुषुप्त जीव को “प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त रहता है" ऐसा बतलाया गया है। इन सबसे निश्चित होता है कि—“सत्" शब्द वाच्य परंब्रह्म सर्वज्ञ परमेश्वर पुरुषोत्तम ही हैं। उक्त श्रुति वाक्यों का समर्थन वृत्तिकार भी करते हैं—“उस अवस्था में जीव सत् से सम्पन्न हो जाता है।" ऊपर जो जीव की सत् के साथ सम्पत्ति और असम्पत्ति दिखलाई गई है उससे निश्चित होता है कि जीव 'प्राज्ञ परमात्मा से ही संलग्न होता है।" इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी जगत का कारण नहीं कह सकते कि— गति सामान्यात् ।१।१।११॥ ‘आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति स इमाँल्लोकानसृजत’” “तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन आकाशस्सम्भूतः । आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी” तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेत- द्यदृग्वेदः' इत्यादिसृष्टिवाक्यानां या गतिः-प्रवृत्तिः, तत्सामान्यात् तत्समानार्थत्वादस्य तेषु च सर्वेषु सर्वेश्वरः कारणमवगम्यते । तस्मादत्रापि सर्वेश्वर एव कारणमिति निश्चीयते । “सृष्टि से पूर्व यह जगत, एक आत्म स्वरूप ही था,उसके अतिरिक्त कोई स्पन्दित पदार्थ नहीं था, उसने संकल्प किया कि लोगों की सृष्टि करूँ तब उसने सृष्टि की'-उस आत्मा से आकाश हुआ और फिर क्रमशः आकाश से वायु,वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी हुई "ऋग्वेद परमात्मा निश्वास मात्र है"-इत्यादि सृष्टि सूचक वक्यों की गति प्रवृत्ति (प्रकाशनशक्ति, तत्सामान्य हेतु अर्थात् उस सर्वज्ञ सर्वेश्वर परमात्मा के अनुरूप ही है। इसलिए यहाँ भी सर्वेश्वर ही जगत् के कारण निश्चित होते हैं। ankurnagpal108@gmail.com