श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६६ ) च तत्क्रियते, प्रत्युत उपादेयत्वेनैव "तत्त्वमसि" "तस्य तावदेव चिरम्" इत्युपदिश्यते । सांख्योक्त प्रधान ही यदि, जगत का कारण, सत् शब्द से वेदों को अभिप्रेत होता तो, मोक्षविरोधी, आत्मवादी सिद्धान्त को मानने वाले श्वेतकेतु को, उसे हेय बतलाकर उसे त्यागने का उपदेश दिया जाता, परंतु ऐसा न करके "तुम वही हो" तुम्हें उसे प्राप्त करने में तभी तक का विलम्ब है, जब तक कि शरीर का बंधन है" इत्यादि उपदेश दिया गया । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी कारण नहीं मान सकते कि— प्रतिज्ञाविरोधात् १।१।१६॥ प्रधानकारणत्वे प्रतिज्ञाविरोधश्च भवति । वाक्योपक्रमे ह्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातम् । तच्च कार्यकारणयोरन- न्यत्वेन कारणभूतसद्विज्ञानात्तत्कार्यभूतचेतनाचेतनप्रपञ्चस्य ज्ञात- तयैवोपपादनीयम् । तत्तु प्रधानकारणत्वे चेतनवर्गस्य प्रधानकार्य- त्वाभावात् प्रधानविज्ञानेन चेतनवर्गविज्ञानासिद्धे विरुद्ध्यते । प्रधान को कारण मानने से प्रतिज्ञा से भी विरुद्धता होती है । वेदांत वाक्यों के उपक्रम (प्रारंभ) में ही, नियम बतलाया गया कि— "एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है ।' उस नियम के अनुसार, कार्य और कारण दोनों में अनन्यता होनी चाहिए अतः कार्यरूप चेतन अचेतन समस्त प्रपंचरूप जगत कारण रूप उस ब्रह्म के स्वरूपानुसार ही प्रतीत होता है । यदि प्रधान को कारण मान ले तो, चेतन वर्ग में, जड प्रधान की कार्यता कहाँ से आवेगी । प्रधान के ज्ञान से, चेतन वर्ग के ज्ञान को सिद्ध करना, सर्वथा विरुद्ध है । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी कारण नहीं है कि— ankurnagpal108@gmail.com