श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६८ ) तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् १।१।७॥ मुमुक्षोः श्वेतकेतोः ‘तत्त्वमसि’ इति सदात्मकत्वानुसन्धानमुप- दिश्य तन्निष्ठस्य “तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्प- त्स्ये” इति शरीरपातमात्रान्तरायो ब्रह्मसम्पत्तिलक्षणो मोक्ष इत्यु- पदिशति, यदि च प्रधानमचेतनं कारणमुपदिश्येत; तदा तदात्म- कत्वानुसन्धानस्य मोक्षसाधनत्वोपदेशो नोपपद्यते “यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति तन्निष्ठस्याचेतन- सम्पत्तिरेव स्यात् । न च मातापितृसहस्रेभ्योऽपि वत्सलतरं शास्त्र- मेवंविधतापत्रयाभिहतिहेतुभूतामचित्सम्पत्तिमुपदिशति । प्रधान- कारणवादिनोऽपि हि प्रधाननिष्ठस्य मोक्षं नाभ्युपगच्छन्ति । मुमुक्षु श्वेत केतु को “तत्त्वमसि” ऐसा तदात्मकता के अनुसंधान का उपदेश देकर “तभी तक मोक्ष का विलंब है जब तक शरीर से छूट नहीं जाता, उसके बाद वह सत् रूप हो जाता है” ऐसा शरीर पात मात्र के अन्तराय वाला ब्रह्म संपत्ति रूप मोक्ष का उपदेश दिया गया है । यदि अचेतन प्रधान को जगत के कारण रूप से बतलाया जाता तो, तदात्मक- त्वानुसंधान रूपी मोक्षसाधनत्वोपदेश का मेल नहीं बैठता ।' पुरुष इस लोक में जैसा संकल्प और अनुष्ठान करता है, वैसी ही मरणोत्तर उसकी गति होती है” इस वाक्य से कैसे मान लिया जाय कि— अचेतन की आराधना से भी गति प्राप्त हो सकती है। माता और पिता से हजारों गुना वात्सल्य भाव से जीवों की रक्षा करने वाले शास्त्र, कहीं तापत्रय की शांति के लिए, जड़ की आराधना का उपदेश दे सकते हैं ? प्रधान कारण वादी भी प्रधान की आराधना करके मोक्ष नहीं पा सकते । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी जगत का कारण नहीं हो सकता कि-- हेयत्वावचनाच्च १।१।८॥ यदि प्रधानमेव कारणं सच्छब्दाभिहितं भवेत् तदा मुमुक्षोः श्वेतकेतोस्तदात्मकत्वं मोक्षविरोधित्वाद्धेयत्वेनैवोपदेश्यं स्यात् । न ankurnagpal108@gmail.com