श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६१ ) व्यक्ति द्वारा "सर्वलोकाधिपति, गाभीर्य औदार्य-वात्सल्य-सौशील्य-शौर्य- वीर्य-पराक्रम आदि गुणों संपन्न तुम्हारे पिता खोये हुए तुम्हें देखने के लिए महल में आकुल हैं" ऐसा सुनते ही "तो मैं जीवित पिता का पुत्र हूं, मेरे पिता वैभव संपन्न हैं' हर्ष विभोर हो जाता है तथा वह राजा अपने पुत्र को निरोग, अतिसुन्दर-सर्वगुण संपन्न सुनकर कृतार्थ हो जाता है, उसे बुलवाने की चेष्टा करता है; प्रयास के बाद वे दोनों एक दूसरे से मिल जाते हैं [ब्रह्म प्राप्ति संबंधी उपदेश भी इसी प्रकार है] यत्पुनः—परिनिष्पन्नवस्तुगोचरस्य वाक्यस्य तत्ज्ञानमात्रे- णापि पुरुषार्थपर्यवसानात् बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवन्नार्थं सद्भावे प्रामाण्यम्—इति । तदसत्—अर्थसद्भावाभावे निश्चिते ज्ञातोऽप्यर्थः पुरुषार्थाय न भवति । बालातुरादीनामप्यर्थसद्भाव भ्रान्त्या हर्षाद्युत्पत्तिः । तेषामेव तस्मिन्नेव ज्ञाने विद्यमाने यद्यर्थाभावनिश्चयो जायेत्, ततः तदानीमेव हर्षादयो निवर्तेरन् । श्रौपनिषदेष्वपि वाक्येषु ब्रह्मास्तित्वतात्पर्याभाव निश्चये ब्रह्मज्ञाने सत्यपि पुरुषार्थपर्यवसानं न स्यात् । अतः "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इत्यादिवाक्यं निखिलजगदेककारणं निरस्तनिखिलदोष गन्धं सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वाद्यनन्तकल्या णगुणाकरमनवधिकातिशया- नन्दं ब्रह्मास्तीति बोधयतीति सिद्धम् । जो यह कहा कि—स्वतः सिद्ध बोधक वाक्य की वाक्यार्थ प्रतीति केवल पुरुषार्थपर्यवसित होने से, बालक और व्यथित पुरुष के फुसलाने वाले वाक्य की तरह, पदार्थ के अस्तित्व में प्रामाणिक नहीं हो सकती । यह असंगत बात है—अर्थ की असत्यता प्रमाणित हो जाने पर, ज्ञात अर्थ भी पुरुषार्थ नहीं हो सकता । बालक और व्यथित पुरुष को जो हर्ष होता है वह उन्हें, अपने अनुकूल प्रतीत होने से भ्रांत होता है, उस वाक्यार्थ की जब उन्हें यथार्थता ज्ञात होती है, तो तत्काल ही उनका हर्ष समाप्त भी हो जाता है । उपनिषदों के वाक्यों में भी यदि, ब्रह्म के अस्तित्व विषयक तात्पर्य का अभाव होता, तो ब्रह्मविषयक ज्ञान होते हुए भी वह ज्ञान कभी पुरुषार्थ साधन में पर्यवसित न हो सकता । ankurnagpal108@gmail.com