भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २६२ ) इसलिए—"यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य—समस्त जगत के एकमात्र कारण, निर्दोषता, सत्यसंकल्पता, सर्वज्ञता आदि अनेक कल्याणमयगुणों के आकर, अतिशय आनंद स्वरूप ब्रह्म के अस्तित्व का ही बोधक है। यह निश्चित मत है । ५. अधिकरण:— "यतो वा इमानि" इत्यादि जगत्कारणवादिवाक्यप्रतिपाद्यं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमस्तहेयप्रत्यनीककल्याणगुणैकतानंब्रह्म जिज्ञास्य- मित्युकम् । इदानीं जगत्कारणवादिवाक्यानां आनुमानिकप्रधानादि प्रतिपादनानर्हतोच्यते– ईक्षतेर्नाशब्दमित्यादिना । जगत् कारणता बोधक "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य प्रतिपाद्य सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, समस्त तुच्छगुणरहित, कल्याणमय गुणों के धाम, ब्रह्म ही जिज्ञास्य हैं, यह बतलाया गया। अब जगत्कारणवादी वाक्यों से अनु- मानिक प्रधान आदि का प्रतिपादन नहीं हो सकता यही ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यादि आठ सूत्रों से सिद्ध करेंगे । ईक्षतेर्नाशब्दम् ।१।१।५॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—"सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवा- द्वितीयम्, तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत" इत्यादि— तत्र संदेहः किं सच्छब्दवाच्यं जगत्कारणं परोक्तमानुमानिकं प्रधानम् ? उतोक्त लक्षणं ब्रह्म इति । छांदोग्योपनिषद् में जो यह कहा गया कि—"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र यह सत् ही था, उसने इच्छा की अनेक होकर प्रकट हो जाऊँ, तब उसने तेज की सृष्टि की" इत्यादि इसमे संदेह होता है कि— उक्त वाक्य में जगत् कारण के लिए प्रयुक्त सत् शब्द वाच्य सांख्य दर्शन का आनुमानिक प्रधान (प्रकृति) है अथवा पूर्वोक्त लक्षण वाला ब्रह्म ही है ? ankurnagpal108@gmail.com