भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २८२ ) आदि प्रमाणों से भेद की प्रतीति होती है। भेद और अभेद की परस्पर विरुद्धता तथा अनादि अविद्यामूलकता से भेद की प्रतीति निष्पन्न होती है, एकमात्र अभेद ही परमार्थ है। तत्र यदुक्तं—भेदाभेदयोरुभयोरपि प्रतीति सिद्धत्वान्न विरोधः- इति-तद्युक्तम्-कस्माच्चित्कस्यचित्विलक्षणत्वंहि तस्मात्तस्य भेदः तद्विपरीतंचाभेदः। तयोस्तथाभावांतथाभावरूपयोरेकत्र संभवमनुन्मत्तः को ब्रवीति ? कारणात्मना जात्यात्मना-वाभेदः कार्यात्मनाव्यक्त्यात्मना च भेदः-इत्याकारभेदादविरोध इति चेत्, न विकल्पासहत्वात्। आकारभेदादविरोधं वदतः, किमेकस्मिन्ना- कारे भेदः आकारान्तरेचाभेदः—इत्यभिप्रायः उतोआकारद्वययोगि वस्तुगतावुभावपीति ? पूर्वस्मिन्कल्पे—व्यक्तिगतो भेदः, जातिगतश्चा- भेद इति नैकस्यद्व्यात्मकता। जातिव्यक्तिरिति चैकमेव वस्त्विति चेत् तर्हि आकारभेदादविरोधः परित्यक्तःस्यात् एकस्मिंश्च विलक्षण- त्वतद्विपर्ययौ विरुद्धावित्युक्तम्। द्वितीये तु कल्पे अन्योन्यविलक्षण माकारद्वयमप्रतिपन्नं च तदाश्रयभूतं वस्त्विति। तृतीयाऽभ्युपगमेऽपि त्रयाणामन्योन्यवैलक्षण्यमेवोपादितं स्यात् न पुनरभेदः। आकारद्वय निरुह्यमाणा विरोधं तदाश्रयभूते वस्तुनि भिन्नाभिन्नत्वमिति चेत्—स्वस्माद्विलक्षणं स्वाश्रयमाकारद्वयं स्वस्मिन्विरुद्ध धर्मद्वय समावेश निर्वाहकं कथंभवेत् ? अविलक्षणंतु कथन्तराम् ? आकार द्वय तद्वतोश्च द्व्यात्मकत्वाभ्युपगमे निर्वाहकान्तरापेक्षयाऽनवस्था स्यात्। यह कहना भी असंगत है कि—भेदाभेद दोनों की ही प्रतीति होती है, इसलिए दोनों में परस्पर विरोध नहीं होता। किसी एक पदार्थ की, किसी अन्य पदार्थ से जो विलक्षणता होती है, वही उनका भेद है और उससे विपरीतता ही अभेद है। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध भावापन्न भेद और अभेद की एक ही स्थान में संभावना की बात, कोई अप्रमत्त व्यक्ति तो कर नहीं सकता। यदि कहें कि-कारणरूप और जातिरूप से अभेद तथा ankurnagpal108@gmail.com