भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३८१ ) बुद्धि आदि उपाधियों के संयोग से, ब्रह्मगत भेद में, अन्योन्याश्रयता भी घटित नही होती है,क्यों कि-उपाधि और उसके संयोग का कर्मकृत होने से अनादि प्रवाह है । एतदुक्तं भवति—पूर्वकर्म संबंधाज्जीवात् स्वसंबद्ध एवोपाधि- रुत्पद्यते तद्युक्तात्कर्म,एवं बीजांकुरन्यायेन कर्मोपाधिसंबंधस्याना- दित्वान्न दोष :-इति । अतो जीवानांपरस्परंब्रह्मणाचाभेदवत् भेदोऽपि स्वाभाविकः, उपाधीनामुपाध्यंतराभावात् तदभ्युपगमनेऽन- वस्थानाच्च । अतो जीवकर्मानुरूपं ब्रह्मणो भिन्नाभिन्नस्वभावा एवोपाधय उत्पद्यन्तइति । कथन यह है कि-पूर्वजन्मार्जित शुभाशुभ कर्म संबद्ध जीव से ही उपाधि की उत्पत्ति होती है और उस उपाधि संबद्ध जीव से शुभा शुभ कर्म की उत्पत्ति होती है, फिर भी बीजांकुरन्याय से, दोनों में परस्पर अन्योन्याश्रिता नहीं होती । जीवों का पारस्परिक और जीव ब्रह्म का भेद स्वाभाविक न होकर औपाधिक है ; बुद्धि आदि उपाधियों से जीवों का पारस्परिक और ब्रह्म के साथ जो भेद अभेद है, उसमें अभेद स्वाभाविक और भेद औपाधिक है। यह बात- उपाधियों की अन्यता के अभाव तथा उनके संभावना से होने वाली अनवस्था से,निश्चित होती है । इससे ज्ञात होता है कि-अपने कर्मानुसार ही जीवों की अनुरूप उपाधियाँ होती है,जो कि ब्रह्म से भिन्नाभिन्न हैं । अत्रोच्यते — अद्वितीयसच्चिदानन्दब्रह्मध्यानविषयविधिपरं वेदांतवाक्यजातमिति वेदांतवाक्यैरभेदः प्रतीयते । भेदावलंबिभिः कर्मशास्त्रैः प्रत्यक्षादिभिश्च भेदः प्रतीयते । भेदाभेदयोः परस्पर विरोधात् अनाद्यविद्यामूलतयाऽपि भेद प्रतीत्युपपत्तेरभेद एव परमार्थ इत्युक्तम् । वे कहते हैं कि—अद्वितीय सच्चिदानंद ब्रह्म ध्यानविषयक विधि के विधायक वेदांत वाक्यों के होने से, उन वेदांत वाक्यों से अभेद की प्रतीति होती है। भेदावलम्बी कर्मविधायक शास्त्र वाक्यों तथा प्रत्यक्ष