भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २६५ ) गया है, अर्थात् सृष्टि संकल्पात्मिका है ऐसा बतलाया गया है। जैसा कि-“उन्होंने इच्छा की कि-लोकों की सृष्टि करूँ, तब इन लोकों की सृष्टि की “उन्होंने इच्छा की और प्राण की सृष्टि की” इत्यादि वाक्यों से सिद्ध होता है। ननु च कार्यगुणेनैव कारणेन भवितव्यम्, सत्यम् सर्वकार्यानु- गुण एव सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सत्यसंकल्पः पुरुषोत्तमः सूक्ष्मचिदचिद्- वस्तुशरीरकः। यथाऽह—“पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः “यस्या व्यक्तं शरीरम् यस्याक्षरंशरीरं यस्य मृत्युःशरीरम्, एष सर्वभूता- न्तरात्मा” इति। तदेतत् “न विलक्षणत्वात्” इत्यादिषु प्रतिपाद- यिष्यते। अत्र सृष्टि वाक्यानि न प्रधानप्रतिपादनयोग्यानीत्युच्यते। वस्तुविरोधस्तु तत्रैव परिहरिष्यते यतूक्तं–प्रतिज्ञादृष्टान्तयोगात् अनुमानरूपमेवेदंवाक्यं इति तदसत्–हेत्वनुपपादनात्। “येनाश्रुतं श्रुतं” इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञाने प्रतिपादयिषिते सर्वात्मना तदसंभवं मन्वमानस्य तत्संभवमात्रप्रदर्शनाय हि दृष्टान्तोपादानम्। ईक्षत्यादिश्रवणादेव हि अनुमानगंधाभावोऽवगतः। (शंका) कार्य के अनुकूल पदार्थ ही, कारण हो सकता है (जड़ जगत के अनुकूल जड़ प्रकृति ही कारण हो सकती है) ऐसी जो शंका की जाती है, वह ठीक है, सर्वकार्यानुगुण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसंपन्न, सत्य- संकल्प पुरुषोत्तम् सूक्ष्मचिद् अचिद् सभी वस्तुओं के रूप में स्थित हैं— जैसा कि— “उस परमात्मा की ज्ञान बल-क्रिया आदि अनेक स्वाभाविक शक्तियाँ सुनी जाती हैं-वह सर्वज्ञ, सर्वविद् और ज्ञान रूपी तपवाला है" अव्यक्त और मृत्यु (प्रकृति और जगत) जिसके शरीर हैं, वही प्राणि- मात्र के अंतरात्मा पापरहित हैं” इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। इसका विशेष प्रतिपादन “न विलक्षणत्वात्” इत्यादि सूत्र में करेंगे। यहाँ बतलावेंगे कि सृष्टि प्रतिपादक वाक्य प्रधान परक नहीं है। ankurnagpal108@gmail.com