श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें१५ ६ आरम्भणाधिकरण [सूत्र १५-२०] १. असत्कार्यवादी कणाद आदि के मतों का दिग्दर्शन स्वमतानुसार कार्य कारण के अभेद का समर्थन । शंकरादि सम्मत जीव ब्रह्मादि विषयक सिद्धान्त का दिग्दर्शन शंकरादिमतों का निराकरण । अपने मत और सिद्धान्त का उपसंहार । २. कार्याधीन करणोपलब्धि के आधार पर कार्य कारण की अभिन्नता का समर्थन । वेदोक्त “असत्” शब्द के अर्थान्तर का विवेचन । कार्य कारण के अभेद में पटादि के दृष्टान्त का प्रदर्शन । एक ही वायु के प्राण अपान आदि भेद के दृष्टान्त से एक ही ब्रह्म की विचित्र जगत्कारणता का उपपादन । —पृ० ६६६-७२४, ७. इतरव्यपदेशाधिकरण (सूत्र २१-२३) १. पूर्वपक्ष—जीव और ब्रह्म की एकता के मत में, सर्वज्ञ ब्रह्म ने अपने लिए अहितकर दुःखमय जगत रचना की, इस असंगति की आशंका । २. (सिद्धान्त)—श्रुति स्मृति पुराणों के आधार पर जीव ब्रह्म के भेद का उपपादन । जड़ और जीव की ब्रह्मभावानुपपत्ति का प्रदर्शन । स्थूल-सूक्ष्म, चेतना- चेतन शरीरक ब्रह्म की कारण और कार्यावस्था का निरूपण । पाषाण आदि के दृष्टान्त से उसकी पुष्टि । अविद्या के हेतु से जीव, ब्रह्म के विभागवादी मत का खण्डन । —पृ० ७२४-३०, ८. उपसंहार दर्शनाधिकरण (सूत्र २४-२५) १. पूर्वपक्ष—साधन निरपेक्ष ब्रह्म की जगत्कर्त्तृत्वानुपपत्ति का दिग्दर्शन । २. (सिद्धान्त)--क्षीर जल आदि के दृष्टान्त से साधन निरपेक्ष ब्रह्म की कर्त्तृता का प्रतिपादन । —पृ० ७३०-३३,