श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें४० १२. साम्परायाधिकरण (सूत्र २७-३१) ज्ञानी के पुण्यपाप त्याग काल का निरूपण । पुण्यपाप त्याग सपंर्क। वाक्य समन्वय का निर्देश । कर्मानुसार कार्याधिकार विशेष प्राप्त जीवों की अधिकार पर्यन्त अवस्थिति का विवेचन । —पृ० १००४-६, १३. अनियमाधिकरण (सूत्र ३२) उपासक मात्र की देवयान गति ब्रह्मलोक प्राप्ति का निरूपण । —पृ० १००६-१२, १४. अक्षर धी अधिकरण (सूत्र ३३-३४) अक्षर ब्रह्म संबंधी अस्थूलता आदि गुणों का सभी विद्याओं में उपसंहार निर्देश, उक्त गुणों के उपसंहार की आवश्यकता का निरूपण । —१०१२-१५, १५. अन्तरत्वाधिकरण (सूत्र ३५-३७) सर्वान्तरपद की परमार्थता का निरूपण । उषस्त और कहोल के प्रश्नार्थ के परस्पर विनिमय का प्रदर्शन । छांदोग्य में एक ही परादेवता के पूर्वापर कीर्त्तन का निरूपण । —पृ० १०१५-२६, १६. कामाद्यधिकरण (सूत्र ३८-४०) छांदोग्य और वाजसनेयोक्त सत्यकामता आदि ब्राह्म गुणों का अभेद निरूपण । नेति नेति श्रुति से सत्यकामता आदि गुणों की अप्रतिषिद्धता ज्ञापन । सगुणोपासना की मोक्षसाधकता का निरूपण ।— पृ० १०२६-३४ १७.तन्निर्धारण नियमाधिकरण (सूत्र ४१) कर्मकाल में कर्मांग उपासना की अवश्यकर्त्तव्यता का खंडन । —पृ० १०३४, १८. प्रदानाधिकरण (सूत्र ४२) अपहतपाप्मता आदि गुणों के साथ गुणी परमात्मा के चिन्तन की आवश्यकता ज्ञापन । —पृ० १०३४-३६, ankurnagpal108@gmail.com