श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१ एक या अनेक के अनुष्ठान की कर्त्तव्यता निरूपण । १. पूर्वपक्ष—कर्मांगाश्रित उपासना में कर्मांग के साथ उपासनानुष्ठान की आवश्यकता का शास्त्र सम्मत युक्तिपूर्ण प्रतिपादन । —पृ०१०५७-६१ २६. यथाश्रयभावाधिकरण (सूत्र ५८-६४) २. (सिद्धान्त)—कर्मांगानुष्ठान के साथ तदाश्रित उपासना की अवश्य कर्त्तव्यता का खंडन, उक्त मत की पुष्टि में शास्त्र समर्थन । —पृ०१०६१-६६ (चतुर्थ पाद) १. पुरुषार्थाधिकरण (सूत्र १-२०) १. बादरायण के मतानुसार विद्या से मुक्ति लाभ का निरूपण । २. जैमिनि के मतानुसार विद्या की मुक्ति साधनता की अर्थवादिता का प्रदर्शन, उक्त मत में शिष्ट सम्मति प्रदर्शन । प्रकारान्तर से विद्या की कर्मांगता का समर्थन । ३. बादरायण मत से सिद्धान्त निरूपण । विद्या की कर्मांगता के विरुद्ध प्रमाण प्रदर्शन । विद्या की कर्मांगता का खंडन मृत व्यक्ति के साथ विद्या और कर्म के पृथक गमन का वर्णन विद्या की कर्मांगता विषयक जैमिनि की युक्ति का सतर्क खंडन जैमिनि प्रदर्शित नियम श्रुति का अर्थान्तर कथन, प्रकारान्तर से नियम श्रुति का प्रतिपादन । वैराग्य सम्पन्न व्यक्ति के गृह त्याग विषय में श्रुति प्रमाण प्रस्तुति । विद्या की कर्मोपमर्दकता प्रदर्शन । कर्मत्यागी संन्यासी के विद्यानुशीलन का समर्थन । ४. आचार्य जैमिनि के मतानुसार संन्यासाश्रम की अवैधता । ५. बादरायणाचार्य के मत से संन्यासाश्रम का सद्भाव तथा वैधता प्रतिपादन । —पृ०१०६७-८६ ankurnagpal108@gmail.com