श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें४३ २. स्तुतिमात्राधिकरण (सूत्र २१-२२) १. पूर्वपक्ष—यज्ञांग उद्गीथ आदि के विषय में उपदिष्ट रसतमत्व आदि के प्रशंसामात्र तात्पर्य का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—यज्ञांग उद्गीथादि के विषय में रसतमत्वादि दृष्टि की विधेयता का प्रतिपादन। —पृ० १०८६-८८ ३. पारिप्लवाधिकरण (सूत्र २३-२४) १. पूर्वपक्ष—उपनिषदुक्त सभी आख्यायिकाओं की पारिप्लव प्रयोगांगता का प्रदर्शन। २. (सिद्धान्त)—आख्यायिकाओं के विद्यामाहात्म्य प्रकाशन तात्पर्य का समर्थन, एकवाक्यता द्वारा सिद्धान्त प्रतिपादन। —पृ० १०८८-८९ ४. अग्नीन्धनाद्यधिकरण (सूत्र २५) ऊर्ध्वरेताओं का यज्ञांग विद्या में अधिकार प्रतिपादन पृ० १०८९-९० ५. सर्वापेक्षाधिकरण (सूत्र २६) कर्म निरत गृहस्थों की विद्योपासना में अग्निहोत्र कर्मानुष्ठान की आवश्यकता प्रतिपादन। पृ० १०९०-९२ ६. शमाद्यधिकरण (सूत्र २६) गृहस्थों के लिए शमदमादि आवश्यकता का प्रतिपादन। —पृ० १०९२-९४ ७. सर्वान्नानुमत्यधिकरण (सूत्र २८-३१) आपत् काल में प्राणात्मदर्शी के लिए सर्वान्नभक्षण की शास्त्रानुमति समर्थन। विशुद्ध आचार से चित्त शुद्धि निरूपण। यथेच्छ आहार निषेध। —पृ० १०९४-९७ ८. विहितत्वाधिकरण (सूत्र ३२-३५) मुक्ति की अभिलाषा से रहित गृही के लिए आश्रमो- चित कर्मानुष्ठान की अनिवार्यता का निर्देश। विद्या के सहकारी साधन के रूप में कर्मानुष्ठान की कर्तव्यता का निरूपण। यज्ञांग और आश्रमांग कर्मों ankurnagpal108@gmail.com