श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७८. ) खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च" इत्याकाशस्यापि कारणं तदाधारभूतं किमिति पृष्टे प्रत्युच्यमानमक्षरं सर्वविकारकारणतया तदाधारभूतं प्रमाणान्तर प्रसिद्धं प्रधानामिति प्रतीयते अतः अक्षरं प्रधानम् । तथा “गार्गि ! जो छायालोक से ऊपर और पृथिवी से भी नीचे है" इत्यादि से लेकर कालत्रयवर्त्ती समस्त पदार्थों के आश्रयरूप कारण आकाश के प्रतिपादन के बाद "आकाश किसमें ओत प्रोत है ?" ऐसे ६आकाश के भी आधारभूत कारण के विषय में प्रश्न किये जाने पर समस्त है गतिक पदार्थों का आधारभूत कारण, अक्षर ही बतलाया गया है। उपदेश-प्रमाणान्तर प्रसिद्ध प्रधान ही प्रतीत होता है, इसलिए अक्षर, प्रधान ही है। सिद्धान्तः-इति प्राप्ते उच्यते-अक्षरमम्बरान्तधृतेः-अक्षरं- परंब्रह्म कुतः ? अम्बरान्त धृतेः, अम्बरस्य-आकाशस्य, अन्तः- पारभूतम्, अव्याकृतमंबरान्तः, तस्य धृतेः तदाधारतयाऽस्याक्षर- स्योपदेशादिति यावत् । अयमर्थः “कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च" इत्यत्राकाश शब्दानिर्दिष्टं न वायुमदम्बरम्, अपितु तत्पार- भूतमव्याकृतम्, अतस्तस्याव्याकृतस्याप्याधारत्वेनोच्यमानमक्षरं नाव्याकृतं भवितुमर्हति इति । उक्त संशय पर सूत्रकार “अक्षरमम्बरान्त धृतेः” सूत्र सिद्धान्तरूप से प्रस्तुत करते हैं। अर्थात् अक्षर परब्रह्म है क्योंकि-अम्बर अर्थात् आकाश के अन्त में स्थित अव्याकृत रूप को, अक्षर के आश्रित बतलाया गया है। "आकाश किसमें ओत प्रोत है ?" इत्यादि में, जिस आकाश का उल्लेख किया गया है, वह वायुपूरित आकाश नहीं है, अपितु उससे भी पार जो अव्याकृत आकाश है, उसी का उल्लेख है । उसी अव्याकृत आकाश के आधार के रूप में, अक्षर बतलाया गया है। ऐसे अव्याकृत आकाश का आधार विकृत प्रधान हो, ऐसा संभव नहीं है । नन्वाकाश शब्दानिर्दिष्टो न वायुमानिति कथमवगम्यते ? उच्यते-“यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदंतराद्यावापृथिवी, ankurnagpal108@gmail.com