श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७९ ) इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश एव तदोतं च प्रोतं च'' इत्युक्ते त्रैकाल्यवर्त्तिनो विकारजातस्याधारतया निर्दिष्ट आकाशो न वायुमदाकाशो भवितुमर्हति, तस्यापि विकारान्तर्गत- त्वात् । अतोऽत्राकाशशब्दनिर्दिष्टं भूतसूक्ष्ममिति प्रतीयते । ततस्त- स्यापि भूतसूक्ष्मस्याधारभूतं किमिति पृच्छ्यते “कस्मिन्नुखल्वाकाश- ओतश्च प्रोतश्च” इति । अतस्तदाधारतया निर्दिश्यमानमक्षरं न प्रधानं भवितुमर्हति । यदि कहो कि—उक्त प्रकरण में आकाश शब्द से अभिहित, परम् पूरित भूताकाश नहीं है, यह कैसे जाना ? तो सुनो—'गार्गि ! जो द्युलोक से ऊपर तथा पृथिवी से नीचे है तथा द्युलोक और पृथिवी जिसके अभ्यन्तर में हैं, जिसे भूत, वर्त्तमान् और भविष्य कहा जाता है, वह आकाश ही ओत प्रोत है” इत्यादि में कहा गया, त्रैलोक्यवर्त्ती, वैकारिक पदार्थों का आधार. आकाश, वायुमान आकाश नहीं हो सकता, क्योंकि वायुमान आकाश तो, विकृत है । इसलिए यहाँ, आकाश शब्द से निर्दिष्ट, भूतसूक्ष्म ही प्रतीत होता है । “आकाश किससे ओत प्रोत है ?” यह प्रश्न भूतसूक्ष्म आकाश के लिए ही पूछा गया है । इन सबसे ज्ञात होता है कि-आधाररूप से निर्दिष्ट अक्षर तत्त्व, विकृत प्रधान नहीं हो सकता । यत्तु श्रुतिप्रसिद्धात् प्रमाणान्तर प्रसिद्धं प्रथमं प्रतीयेत इति तन्न, अक्षर शब्दस्यावयवशक्त्या स्वार्थ प्रतिपादने प्रमाणान्तरान- पेक्षणात् संबंधग्रहणदशायामर्थस्वरूपं येन प्रमाणेनावगम्यते, न तत्प्रतिपादनदशायामपेक्षणीयम् । जो यह कहा कि-श्रुति प्रसिद्ध से प्रमाणान्तर प्रसिद्ध अर्थ की प्रतीति प्रथम होती है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि-अक्षर शब्द से सीधा सीधा जो अर्थ प्रतीत होता है, उसके प्रतिपादन के लिए, अन्य प्रमाणों की आवश्यकता ही नहीं है; शब्द और अर्थ के संबंध, में अर्थ के स्वरूप