भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४८८ ) प्रसिद्धि प्रकर्षात् । “तदस्मिन्यदंतः तदन्वेष्टव्यम्” इत्यन्वेष्टव्या- न्तरस्याधारतया प्रतीतेश्च । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि-“इस ब्रह्मपुर में जो सूक्ष्म- पुण्डरीक गृह है जिसमे कि सूक्ष्म आकाश विद्यमान है, उसके भी अंदर जो विद्यमान है, उसी के अन्वेषण और जानने की चेष्टा करनी चाहिए” इस पर संशय होता है कि-उल्लेख्य हृदयपुण्डरीक मध्यवर्ती दहराकाश, महाभूत विशेष आकाश है, अथवा जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह सकते है कि-महाभूतविशेष आकाश ही है; आकाश शब्द, भूताकाश और परमात्मा दोनो के लिए ही प्रयुक्त होता है, पर भूताकाशरूप मे अधिक प्रसिद्ध है तथा “तदस्मिन्” इत्यादि में अन्वेष्टव्य का आन्तरिक आधार के रूप में जो वर्णन किया गया है उससे भी, भूताकाश की ही प्रतीति होती है । सिद्धान्तः-इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते-दहरउत्तरेभ्यः दहराकाशः परं ब्रह्मः, कुतः ? उत्तरेभ्यो वाक्यगतेभ्यो हेतुभ्यः । “एष आत्माऽ- पहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघित्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्प” इति निरुपाधिकात्मत्वमपह पाप्मत्वादिकं सत्य कामत्वं सत्यसंकल्पत्वं चेति दहराकाशे श्रूयमाणा गुणाः, दहराकाशं परं ब्रह्मेति ज्ञापयंति । उक्त संशश की निवृत्ति के लिए सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “दहर- उत्तरेभ्यः” सूत्र प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् दहराकाश पर ब्रह्म है-क्योंकि- उक्त वाक्य के परवर्त्ती वाक्य में जो दहर संबंधी हेतु प्रस्तुत किये गए हैं उनसे यही निर्णय होता है । “यह आत्मा निष्पाप-अजर-अमर-; शोक- भूख-प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है ।” इस परवर्त्ती वाक्य मे, दहराकाश के जो गुण कहे गए है, वे दहराकाश में स्थित, स्वाभाविक निष्पाप, सत्यकाम सत्यसंकल्प परब्रह्म की विशेषताओ के द्योतक है । “अथ ह इहात्मानमनुविद्य ब्रजंत्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां सर्वेषुलोकेषु कामचारो भवति “इत्यादिना” यं कामं कामयते ankurnagpal108@gmail.com