श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८६ ) सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठंति तेन संपन्नो महीयते” इत्यंतेन दहरा- काशवेदिनः सत्यसंकल्पत्व प्राप्तिश्चोच्यमानं दहराकाशं परं ब्रह्मोत्य- वगमयति । तथा—“जो इस लोक में, परमात्मा और उनके संकल्पों को जान लेता है, वह देहांत के बाद सभी लोकों में स्वच्छंदतापूर्वक भ्रमण कर सकता है” इत्यादि से तथा “ऐसा व्यक्ति जो भी कामनायें करता है, वह तत्काल उसके समक्ष प्रस्तुत हो जाती हैं जिससे कि वह प्रफुल्ल हो जाता है” इस अंतिम वाक्य से, दहराकाश के ज्ञाताओं की सत्यसंकल्पता की जो प्राप्ति बतलाई गई है, वह दहराकाश की पर ब्रह्मता का द्योतन करती है । “यावान्वाऽयमाकाशस्तावन् एषोऽन्तर हृदय आकाशः” इत्यु- पमानोपमेयभावश्च दहराकाशस्य, भूताकाशत्वे नोपपद्यते । हृदया- वच्छेदनिबंधन उपमानोपमेय भाव इति चेत्-तथा सति, हृदया- वच्छिन्नस्य द्यावापृथिव्या