श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वाभाविनवधिकातिशय कल्याणगुणजातं च ध्येयं “तदन्वष्टव्यम्” इत्युपदिश्यते । अत्र “तदन्वेष्टव्यम्” इति तच्छब्देन दहराकाशम्, तदन्तर्वर्तिगुणजातं च परामृश्य तदुभयमन्वेष्टव्यमित्युपदिश्यते, “तदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म” इत्यनूद्य तस्मिन् दहर- पुण्डरीकवेश्मनि यो दहराकाशः, यच्च तदंतर्वर्तिगुणजातम् तदुभय- मन्वेष्टव्यमिति विधीयत इत्यर्थः । आपत्ति उचित ही है क्योंकि उक्त श्रुति में दहराकाश और उसके मध्यवर्त्ती आकाश का भेद नहीं बतलाया गया है ऐसा प्रतीत होता है, पर उस श्रुति में भेद दिखलाया गया है, विश्लेषण करने पर ही ज्ञात हो सकता है—जैसे कि—“इस ब्रह्मपुर में दहर पुंडरीक कोष है, उसमें जो दहर आकाश है, उसके मध्यवर्त्ती का अन्वेषण करना चाहिए।” इस वाक्य में, ब्रह्मपुर शब्द से उपास्य परब्रह्म के स्थानीय उपासक के शरीर बतलाकर तथा, उस शरीर के मध्यवर्त्ती उसी के अवयव, कमल के आकार वाले सूक्ष्म हृदय को परब्रह्म का घर बतलाकर, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति- मान, आश्रित, करुणा सागर, उपासक के अनुगृह के लिए उसी में स्थित, सूक्ष्मरूप से ध्येय को, दहराकाश शब्द से निर्देश करके, उसी के अन्तर्वर्त्ती, स्वभाव से निष्पाप, महान्, सत्यकाम सत्यसंकल्प आदि गुणों वाले ध्येय को अन्वेष्टव्य कहा गया है। ‘तदन्वेष्टव्यम्’ पद में “तद्” शब्द दहरा- काश और उसके अन्तवर्त्ती गुणों, दोनों का ही द्योतक है, इन दोनों को ही अन्वेषणीय कहा गया है। “इस ब्रह्मपुर में जो सूक्ष्म पुंडरीक गृह है” इस वाक्य में पुनरुल्लेख पूर्वक, उसी दहर पुंडरीक में स्थित दहराकाश और उनके अन्तवर्त्ती गुणों का अन्वेषण बतलाया गया है। दहराकाश शब्द निर्दिष्टस्य परब्रह्मत्वं “तस्मिन्यदन्तः” इति निर्दिष्टस्य च तद्गुणत्वम्, तच्छब्देनोभयं परामृश्योभयस्याप्यन्वेष्ट- व्यतया विधानं च कथमवगम्यत ? इति चेत्—तदवहितमनाश्शृणु— “यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तहृदय आकाशः” इति दहराकाश- स्यातिमहत्तामभिधाय । “उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अंतरेव समाहिते