श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंिति तमेव दहराकाशं परामृश्य तस्मिन्नस्योपासक- Wait, in line 4: "पुनरप्यास्मिन्निति" or "पुनरप्यास्मिन्निति"? Let's check line 4: प ु न र प ्य ़ ा? No, प ु न र प ्य ा स् म ि न ् न ि त ि Yes: "पुनरप्यास्मिन्निति" (notice the ā-matra: प्यास्मिन्निति, even though in Sanskrit it's पुनरप्यस्मिन्निति, here it clearly has an 'ā' matra: "पुनरप्यास्मिन्निति"). Wait, look at line 3: "तदास्मिन्समाहितं" -> in shruti it is "तदस्मिन्समाहितम्", but printed as "तदास्मिन्समाहितं". And in line 4: "पुनरप्यास्मिन्निति"! It repeats the ā-kāra from the quote! Exactly as printed.
स्येहलोके यद्भोग्यजातमस्ति, यच्च मनोरथमात्र गोचरमिह नास्ति, Wait, in line 5: "मनोरथमात्र गोचरमिह" - space between मात्र and गोचर? Yes.
सर्व्वं तद्भोग्यजातं अस्मिन्दहराकाशे समाहितमिति निरतिशय भोग्य- Wait, space between