भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 555

( ४६३ ) यदि कहो कि-दहराकाश शब्द का तात्पर्य परब्रह्म तथा-“तस्मिन् यदंतः” इत्यादि में उसके गुणों को उपास्य कहा गया है, यह कैसे जाना ? तो ध्यान देकर सुनो--“जितना यह भूताकाश है, उतना ही हृदयस्थ आकाश है” इसमें दहराकाश की महत्ता बतलाकर-“द्युलोक और भूलोक, अग्नि और वायु, सूर्य और चंद्र, विद्युत और नक्षत्र, ये सभी अभ्यंतर में हैं” इसमें अस्मिन् शब्द से दहराकाश को स्वभावतः संपूर्ण जगत का आधार बतलाकर--“जो कुछ भी यहाँ है, और जो नहीं है, वह सभी कुछ इस दहर में समाहित है” इसमें पुनः अस्मिन् शब्द से दहरा- काश का उल्लेख करके उपासक के शरीर में जो भोग्य हैं, जो कि एक- मात्र अभिलाषा के विषयीभूत हैं, वे सारे ही इस निरतिशय दहराकाश के निरतिशय भोग्य हैं, इत्यादि का प्रतिपादन करके देह के अवयव हृदय में होते हुए भी, देह के जराध्वंस आदि विकारों से रहित, परमकारण अतिसूक्ष्म दहराकाश की निर्विकारतमता का प्रतिपादन करते हुए, उसी दहराकाश को “यही सत्यस्वरूप ब्रह्मपुर है” समस्त जगत के आधार स्वरूप ब्रह्मपुर बतलाया गया है। “इसी मे कामनायें समाहित है” इत्यादि में अस्मिन् शब्दवाची दहराकाश के काम्यगुणों को काम शब्द से बतलाते हुए अंतर्वर्ती कहा गया है। उस दहराकाश के काम्यभूत कल्याण गुण विशिष्टों को “एष आत्माअपहतपाप्मा” से लेकर “सत्य- संकल्पः” तक बतलाकर “प्राणी इसी में अनुप्रविष्ट होते हैं” इत्यादि से “उनकी सभी लोकों में यथेच्छगति हो जाती है” इस अंतिम वाक्यतक यह बतलाया गया कि-आठ विशिष्ट गुणों से युक्त दहराकाश नामवाले आत्मा को न जानने से ही, जीव भोग्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए कर्मा- सक्त रहता है, जिससे उसे ध्वंशशील संसार ही प्राप्त होता है, उसके विचार भी असत्य होते हैं। तथा--“जो इस आत्मा को जानकर सत्य संकल्प वाला होता है, उसकी सभी लोकों में अप्रतिहत गति होती है” इसमें निर्दिष्ट दहराकाश आत्मा और उसके अन्तरस्थ-काम्यभूत निष्पाप आदि गुणों के ज्ञाता की, उदारगुण सागर परमपुरुष की कृपा से, सभी कामनाओं की प्राप्ति और सत्यसंकल्पता होती है। उक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, उसके अंदर स्थित निष्पापता आदि विशिष्ट गुणों सहित, उसका अनुसंधान करना चाहिए; उसे ही ज्ञातव्य बतलाया गया है। वाक्यकार ने भी ऐसा ही कहा है--“उसमें जो ankurnagpal108@gmail.com