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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४६३ ) यदि कहो कि-दहराकाश शब्द का तात्पर्य परब्रह्म तथा-“तस्मिन् यदंतः” इत्यादि में उसके गुणों को उपास्य कहा गया है, यह कैसे जाना ? तो ध्यान देकर सुनो--“जितना यह भूताकाश है, उतना ही हृदयस्थ आकाश है” इसमें दहराकाश की महत्ता बतलाकर-“द्युलोक और भूलोक, अग्नि और वायु, सूर्य और चंद्र, विद्युत और नक्षत्र, ये सभी अभ्यंतर में हैं” इसमें अस्मिन् शब्द से दहराकाश को स्वभावतः संपूर्ण जगत का आधार बतलाकर--“जो कुछ भी यहाँ है, और जो नहीं है, वह सभी कुछ इस दहर में समाहित है” इसमें पुनः अस्मिन् शब्द से दहरा- काश का उल्लेख करके उपासक के शरीर में जो भोग्य हैं, जो कि एक- मात्र अभिलाषा के विषयीभूत हैं, वे सारे ही इस निरतिशय दहराकाश के निरतिशय भोग्य हैं, इत्यादि का प्रतिपादन करके देह के अवयव हृदय में होते हुए भी, देह के जराध्वंस आदि विकारों से रहित, परमकारण अतिसूक्ष्म दहराकाश की निर्विकारतमता का प्रतिपादन करते हुए, उसी दहराकाश को “यही सत्यस्वरूप ब्रह्मपुर है” समस्त जगत के आधार स्वरूप ब्रह्मपुर बतलाया गया है। “इसी मे कामनायें समाहित है” इत्यादि में अस्मिन् शब्दवाची दहराकाश के काम्यगुणों को काम शब्द से बतलाते हुए अंतर्वर्ती कहा गया है। उस दहराकाश के काम्यभूत कल्याण गुण विशिष्टों को “एष आत्माअपहतपाप्मा” से लेकर “सत्य- संकल्पः” तक बतलाकर “प्राणी इसी में अनुप्रविष्ट होते हैं” इत्यादि से “उनकी सभी लोकों में यथेच्छगति हो जाती है” इस अंतिम वाक्यतक यह बतलाया गया कि-आठ विशिष्ट गुणों से युक्त दहराकाश नामवाले आत्मा को न जानने से ही, जीव भोग्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए कर्मा- सक्त रहता है, जिससे उसे ध्वंशशील संसार ही प्राप्त होता है, उसके विचार भी असत्य होते हैं। तथा--“जो इस आत्मा को जानकर सत्य संकल्प वाला होता है, उसकी सभी लोकों में अप्रतिहत गति होती है” इसमें निर्दिष्ट दहराकाश आत्मा और उसके अन्तरस्थ-काम्यभूत निष्पाप आदि गुणों के ज्ञाता की, उदारगुण सागर परमपुरुष की कृपा से, सभी कामनाओं की प्राप्ति और सत्यसंकल्पता होती है। उक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, उसके अंदर स्थित निष्पापता आदि विशिष्ट गुणों सहित, उसका अनुसंधान करना चाहिए; उसे ही ज्ञातव्य बतलाया गया है। वाक्यकार ने भी ऐसा ही कहा है--“उसमें जो ankurnagpal108@gmail.com

विशिष्ट गुणों का निर्देश है, वह ज्ञातव्य है' इत्यादि से सिद्ध होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है । गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिंग च ।१।३।१४॥ इतश्च दहराक शः परंब्रह्म "तद्यथा हिरण्य निधिं निहितमक्षे त्रज्ञा उपर्युपरि संचरंतो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्ग- च्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दत्यनृतेन हि प्रत्यूढाः” इति एतमिति प्रकृतं दहराकाशं निर्दिश्य तत्राहरहःसर्वेषां क्षेत्रज्ञानां गमनं, गंतव्यस्य तस्य दहराकाशस्य ब्रह्मलोकशब्द निर्देशश्च दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयतः । इसलिए भी दहराकाश परब्रह्म है कि-“जैसे भूविद्या को न जानने वाले, भूमि के ऊपर-ऊपर ही घूमते रहते हैं, भूमिस्थ सुवर्णराशि को प्राप्त नहीं करते, वैसे ही सांसारिक प्रवाह में बहते हुए प्राणी, ब्रह्मलोक की प्राप्ति नहीं कर पाते, क्योंकि वे अज्ञान से आवृत हैं” इस वाक्य में "एतं” पद से उल्लेख्य ब्रह्मलोक को बतलाकर-समस्त प्रजाओं के नित्य गमन की बात कही गई, तथा दहराकाश शब्द से ब्रह्मलोक का उल्लेख किया गया, इन दोनों से दहराकाश की परब्रह्मता ज्ञात होती है । कथमनयोरस्य परब्रह्मत्वसाधकत्वमित्यत आह-तथाहि दृष्टम् इति । परास्मिन् ब्रह्मणि सर्वेषां क्षेत्रज्ञानामहरहस्सुषुप्तिकाले गमन- मभ्यत्राभिधीयमानं दृष्टम् “एवमेव खलु सोम्येमास्सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपत्स्यामहै” इति । “सत आगम्य न विदुः सत् आगच्छामह" इति च । तथा ब्रह्मलोक शब्दश्च परास्मिन् ब्रह्मणि दृष्टः 'एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच” इति । माभूदन्यत्र ब्रह्मणि गमन दर्शनम्, एतदेव तु दहराकाशे सर्वेषा क्षेत्रज्ञानां प्रलयकाल एव निरस्तनिखिलदुःखानां सुषुप्तिकालेऽवस्थानं श्रूयमाणम- स्य परब्रह्मत्वे पर्याप्तं लिंगम् । तथा ब्रह्मलोक शब्दश्च समानाधि- करण वृत्त्याऽस्मिन्दहराकाशे प्रयुज्यमानोऽस्य ब्रह्मत्वे प्रयोगान्तर

( ४१५ ) निरपेक्षं पर्याप्तं लिंगमित्याह-लिंग च इति । निषादस्थपति न्याया- च्च षष्ठी समासात् समानाधिकरण समासो न्याय्यः । यदि कहो कि-ये दोनों ही दहराकाश की ब्रह्मात्मकता को सिद्ध करने वाले हैं, यह कैसे जाना ? सो इनका ऐसा ही वर्णन मिलता है । सभी जीव, सुषुप्ति अवस्था में परब्रह्म में प्रविष्ट होते हैं, ऐसा भी वर्णन मिलता है- 'हे सौम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सारी प्रजा, नित्य, सद्ब्रह्म से संपन्न होकर, यह नहीं जान पाती कि-वह सद्ब्रह्म से संलग्न है तथा सद्ब्रह्म से लौटने पर भी यह नहीं जान पाती कि-सद्ब्रह्म के निकट से लौटे हैं" इस प्रकार ब्रह्मलोक शब्द परब्रह्म के लिए प्रयुक्त देखा जाता है।" उसने कहा हे सम्राट ! यही ब्रह्मलोक है" इत्यादि ही ब्रह्म दर्शन संबंधी पर्याप्त प्रमाण हैं। प्रलय काल की तरह सुषुप्ति अवस्था में भी, दहराकाश में अवस्थान करने पर, जीवों के आत्यंतिक दुःख का अभाव हो जाता है, ऐसा श्रुतियों का वचन है। इसी से दहराकाश की ब्रह्मरूपता

( ४६६ ) भूमि में गड़े हुए धन को, भूमि पर घूमते फिरते हुए भी न देख पाते हैं न जान पाते हैं, यह रहस्य भी वैसा ही है । सेयमेवमंतरात्मत्वेन स्थितस्य दहराकाशस्योपरि तन्नियमतानां सर्वासां प्रजानामजानतीनां सर्वदा गतिस्य दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । तथाहि अन्यत्र परस्यब्रह्मणोऽन्तरात्मतयाऽवस्थितस्य स्वनियम्याभिस्स्वस्मिन् वर्त्तमानाभिः प्रजाभिरवेदनं दृष्टम् । यथा अंतर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद, यस्यात्मा शरीरं, य आत्मानमंतरौ यमयति” इति “अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतश्रोता” इति च । मामूदन्यत्र दर्शनम्, स्वयमेवत्वियं निधिदृष्टान्तावगत परमपुरुषार्थं भावस्यास्य हृदयस्थस्योपरितदाधा- रतऽहरहस्सर्वदा सर्वासांप्रजानामजानातोना गतिस्य परब्रह्मत्वे पर्याप्तं लिंगम् । अन्तरात्मा रूप से अवस्थित दहराकाश के ऊपर की जो स्थिति है वह भी, उसी के नियमन पर आधारित है, यही दहराकाश की पर- ब्रह्मता का प्रमाण है । अन्यान्य श्रुतिवाक्यों में भी, परब्रह्म की अन्तरात्मा रूप से स्थिति और नियामकता, तथा जीवात्मा की अल्पज्ञता का वर्णन किया गया है—जैसे कि—अन्तर्यामी ब्राह्मण में—‘जो आत्मा में ही सदा स्थित है, पर आत्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा ही उसका शरीर है, वह अन्दर बैठा ही आत्मा का संयमन करता है,’’ वह अदृष्ट होकर भी द्रष्टा तथा अश्रुत होकर भी श्रोता है’’ इत्यादि । इससे अधिक अब और प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है । निधि के दृष्टांत से जिसकी परपुरुषा- र्थता बतलाई गई, हृदयस्थ उस दहराकाश के ऊपर ही ऊपर सदा वर्त्तमान जीवात्माओं की, उसकी ओर होने वाली गति ही, दहराकाश की परब्रह्मता का पर्याप्त प्रमाण है । इतश्च दहराकाशः परब्रह्म—दहराकाश इसलिए भी परब्रह्म है कि— धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ।१।३।१५॥ “अथ य आत्मा” इति प्रकृतं दहराकाशं निर्दिश्य “स सेतु- ankurnagpal108@gmail.com

( ४६७ ) विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय” इत्यस्मिञ्जगद्विधरणं श्रूयमाणं दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । जगद् विधरणं हि परस्यब्रह्मणो महिमा “एष सर्वेश्वर एष सर्वभूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्वि- धरण एषां लोकानमसंभेदाय” इति “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” इत्यादिभ्यः । स चायं तस्य परस्य ब्रह्मणो धृत्याख्यो महिमाऽस्मिन् दहराकाश उपलभ्यते; अतो दहराकाश परब्रह्म । “जो आत्मा में” इत्यादि में दहराकाश के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करके—‘इस समस्त जगत के संभेद अर्थात् सांकर्य का निवारण करने वाला वह सेतु है” इत्यादि में जो जगद् धारकता बतलाई गई है, उससे दहराकाश की, परब्रह्मता ज्ञात होती है । परब्रह्म की महिमा की बतलाने वाली जगद्धारकता “यही सर्वेश्वर-भूताधिपति-भूतपालक और जगत् की मर्यादा की रक्षा करने वाले सेतु हैं, “हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही सूर्य और चंद्र स्थित रहते हैं” इत्यादि वाक्यों से भी ज्ञात होती है । जगद्धारकता रूप परब्रह्म की महिमा, दहराकाश में भी उपलब्ध है, इसलिए भी दहराकाश, परब्रह्म है । प्रसिद्धेश्च ।१।३।१६॥ आकाशशब्दश्च परस्मिन् ब्रह्मणि प्रसिद्धः “को वा ह्येवान्यात् कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनंदो न स्यात्”—“सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यंते” इत्यादिषु; अपहतपाप्मत्वादि- गुण सनाथा प्रसिद्धिर्भूताकाश प्रसिद्धेर्बलीयसी इत्यभिप्रायः । “यह आकाश यदि आनंद स्वरूप न होता तो, आनंद की चेष्टायें कौन कर सकता ?” सारे ही प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं” इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त आकाश शब्द, परब्रह्म के लिए प्रसिद्ध है । निष्पापता आदि गुणों से युक्त जो प्रसिद्धि है, वही भूताकाश से, दहराकाश की श्रेष्ठता की द्योतिका है । ankurnagpal108@gmail.com

( ४६८ ) ‥ एवं तावद्दहराकाशस्य भूताकाशत्वं प्रतिक्षिप्तम् । अथेदानीं दहराकाशस्य प्रत्यगात्मत्वमाशंक्य, निराकर्तुमुपक्रमते । अब तक दहराकाश की, भूताकाशता का निराकरण किया गया । अब आगे दहराकाश की जीवात्मकता की आशंका करके, उसका निरा- करण करते हैं— इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ।१।३।१७॥ यदुक्तं वाक्य शेषवशाद् दहराकाशः परंब्रह्मेति, तदयुक्तम्; वाक्यशेषे परमादितरस्य जीवस्यैव साक्षात् परामर्शात् “अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेन रूपेणा- भिनिष्पद्यते एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म” इति । यद्यपि “दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः” इति हृदयपुंडरीक मध्यव- र्त्तितयोपदिष्टस्याकाशस्योपमानोपमेयभावाद्यसंभवाद् भूताकाशत्वं न संभवति, तथापि वाक्यशेषवशात् प्रत्यगात्मत्वं युक्तमाश्रयितुम् । आकाशशब्दोऽपि प्रकाशादियोगाज्जीव एव वर्त्तिष्यत इति चेत्— अत्रोत्तरं नासम्भवात्–इति । नायं जीवः, न हि अपहतपाप्मत्वादयो गुणाः जीवे संभवंति । जो यह कहा कि—अंतिमवाक्य से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, सो कथन ठीक नहीं, उसमें तो परमात्मा से भिन्न जीवात्मा का ही स्पष्ट उल्लेख प्रतीत होता है-जैसे कि-“यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परंज्योति को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त करता है यही अमृत-अभय-और ब्रह्मस्वरूप है ।” इत्यादि यद्यपि-“दहर के अंदर का आकाश” इत्यादि में उल्लेख्य आकाश का वाह्याकाश के साथ उपमानोपमेय भाव संभव नहीं है, फिर भी हृदय पुंडरीक के मध्यवर्ती दहरकाश की भूताकाशता हो सकती है यह ठीक है, किंतु वाक्य शेष के अनुसार उसे जीवात्मा मानना उचित है । प्रकाश- मयता आदि गुणों से संबद्ध होने से आकाश शब्द जीव वाची ही हो सकता है । ankurnagpal108@gmail.com

( ४६६ )

उक्त संशय के उत्तर में सूत्र में कहा गया "नासम्भवात्" अर्थात् निष्पापता आदि गुण जीव में संभव नहीं है, इसलिए यह जीव नहीं है। उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु । १।३।१८॥ उत्तरात्-प्रजापति वाक्यात्, जीवस्यैवापहतपाप्मत्वादिगुण योगो निश्चीयत इति चेत्-एतदुक्तं भवति-प्रजापति वाक्यं जीव- परमेव, तथाहि-"य अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽ- पिपासः सत्य संकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानाति "इति प्रजापतिवचनमैतिह्यरूपेणोपश्रुत्यान्वेष्टव्यात्म स्वरूपजिज्ञासया प्रजापतिमुपसेदुषे मघवते प्रजापतिर्जागरितस्वप्नसुषुप्यवस्थं जीवा- त्मानं स शरीरंक्रमेण सुश्रूषुयोग्यतापरीचिक्षिषयोपदिश्य तत्रतत्र भोग्यमपश्यते परिशुद्धात्मस्वरूपोपदेशयोग्याय तस्मै मघवते- "मघवन् मर्त्यं वा इंद शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्या- त्मनोऽधिष्ठानं" इति शरीरस्याधिष्ठानतामात्मनश्चाधिष्ठातृताम- शरीरस्य च तस्यामृतत्वस्वरूपतां चोक्त्वा "न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । अशरीरं वाव संतं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इति कर्मारब्धशरीर योगिनस्तदनुगुणसुखदुःख भागित्वरूपानर्थं तद्विमोक्षे च तदभावमभिधाय "एवमेवैष संप्रसादोऽस्माच्छरीरा- त्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" इति जीवा- त्मनः स्वरूपमेव शरीर वियुक्तमुपदिदेश । बाद के प्रजापति वाक्य से, निष्पापता आदि गुण, जीव के ही निश्चित होते है, कथन यह है कि-प्रजापति वाक्य जीव पर कही है- जैसा कि- "जो निष्पाप, अजर, अमर, शोक तथा भूखा-प्यासा रहित सत्य संकल्प है, वह अन्वेष्टव्य और जिज्ञास्य है, जो उसे जान लेते है, समस्त कामनाओं और समस्त लोकों को प्राप्त कर लेते हैं" इस प्रजापति

( ५०० ) वाक्य को ऐतिह्य (जनश्रुति) के रूप श्रवण करके इन्द्र, अन्वेषणीय आत्म स्वरूप की जिज्ञासा से प्रजापति के पास गए। प्रजापति ने जिज्ञासु की योग्यता की परीक्षा के लिए क्रमशः जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थात्रय संपन्न सशरीर जीवात्मा का उपदेश देकर देखा कि, इन्द्र पर उपदिष्ट विषयों में भोग्य का कोई असर नहीं हुआ तब, विशुद्ध आत्मस्वरूप उपदेश योग्य इन्द्र से उन्होंने- "हे मघवन् ! यह शरीर मर्त्य और मृत्यु ग्रस्त है, यही अशरीरी अमृत आत्मा का आश्रय स्थल है" इत्यादि से शरीर की अधिष्ठाज्ञता, आत्मा की अधिष्ठातृता तथा अशरीर आत्मा की अमृत स्वरूपता बतलाकर- "शरीरी रहते हुए दुःख सुख का अंत नहीं होता, सदा के लिए शरीर के समाप्त हो जाने पर सुख दुःख का स्पर्श नहीं होता।" इस श्रुति से पुण्यपापमय कर्मोत्पादित, शरीर धारी की व्यक्ति के कर्मानुसार सुख दुःख आदि भोगों के ज्ञापन के लिए, शरीर की समाप्ति पर, सुख दुःख का प्रभाव बतलाकर- "यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परं ज्योतिरूपता को प्राप्त कर अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।" इत्यादि में शरीर विमुक्त जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश दिया। “स उत्तमः पुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा, यानैर्वा, ज्ञातिभिर्वा, नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्” इति प्राप्यस्य परस्य ज्योतिषः पुरुषोत्तमत्वम्, निवृत्तितिरोधानस्य परं ज्योतिरुपसंपन्नस्य प्रत्यगात्मनो ब्रह्मलोके यथेष्टभोगावाप्तिम् प्रियाप्रियाविमुक्तकर्मनिमित्तशरीराद्यपुरुषार्थनिनुसंधानं चाभिधाय- “स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमस्मिन् शरीरे प्राणो युक्तः” इति यथोक्त स्वरूपस्यैव संसारदशायां कर्मतंत्रम् शरीर योगं युग्यशकटयोगदृष्टांतेनाभिधाय-अथ यत्रैदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः सः चक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गंधायघ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ वो वेदेदं शृण्वानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम्, अथ यो ankurnagpal108@gmail.com

( ५०१ ) वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः” इति चक्षुरादिनां करणात्वं, रूपादीनां ज्ञेयत्वमस्य च ज्ञातृत्वं प्रदर्श्य तत एव शरीरे- न्द्रियेभ्योऽस्य व्यतिरेकमुपपाद्य “स वा एष एतेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन्न्मते य एते ब्रह्मलोके” इति तस्यैव विधूतकर्मनिमित्त शरीरेन्द्रियस्य मनः शब्दाभिहितेन दिव्येन स्वाभाविकेन ज्ञानेन सर्वकामानुभवमुक्तवा “तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषां सर्वे च लोका आप्ताः सर्वे च कामाः” इत्येवंविधमात्मानं ज्ञानिनो जानंतीत्यभिधाय “सर्वांश्चलोकान्नाप्नोति सर्वांश्चकामान्यस्त- मात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच” इत्येवंविधमात्मानं विदुषः सर्वलोकसर्वकामावाप्त्युपलक्षितं ब्रह्मानुभवं फलमभिधायोप- संहृतम् । अतस्तत्रापहतपाप्मत्वादि गुणको ज्ञातव्यतया प्रक्रान्तो जीव एवेत्यवगतम् । अतो जीवस्यापहतपाप्मत्वादयः संभवंति। अतो दहरवाक्यशेषे श्रूयमाणस्य जीवस्यापहपाप्मत्वादिगुणसंभवात् स एव दहराकाश इति निश्चीयते इति चेत् इति । वह उत्तम पुरुष, उस अवस्था में, हंसता, खेलता, स्त्रीयान, और ज्ञाति जनों के साथ रमण करता हुआ, मानव देह को भुलाकर विचरण करता है” इस वाक्य में प्राप्य, परंज्योतिषरूप पुरुषोत्तमत्व, तथा अविद्याकृत स्वरूप तिरोधान निवृत्ति के उपरांत, परंज्योतिसंपन्न जीवात्मा की, ब्रह्मलोक में यथेष्ट भोगरवाप्ति, एवं प्रिय अप्रिय संयोग सहकृत कर्म से समुत्पन्न शरीरादि का अपुरुषार्थत्व वतलाकर-“जैसे कि घोड़ा या बैल गाड़ी से जुता रहता है, वैसे ही यह प्राण इस शरीर में जुटा हुआ है” इस क्षुद्र शकट के दृष्टांत द्वारा, जीव की संसार दशा में कर्माधीन शरीर संबंध की पुष्टि करके-“जिसमें यह चक्षु द्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप गुण के लिए नेत्रेन्द्रिय है, गंध ग्रहण के लिए नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं शब्द बोलूं वही आत्मा है उसके शब्दोच्चारण के लिए वागिन्द्रिय है, जो ऐसा जानता है कि मैं शब्द श्रवण करूं वह भी आत्मा है, उसके श्रवण के लिए ankurnagpal108@gmail.com

( ५०२ ) श्रवणेन्द्रिय है। जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ वह आत्मा है, मन उसका दिव्य नेत्र है ।" इत्यादि में चक्षु आदि इन्द्रियों की करणता, रूप आदि विषयों की ज्ञेयता, तथा जीव की ज्ञातृता बतलाकर-शरीरादि से उसकी भिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। "जो ये भोग इस ब्रह्मलोक में हैं उन्हे यह जीव मनोमय दिव्य चक्षु द्वारा देखता हुआ रमण करता है" इस श्रुति में कर्मजन्य शरीरेन्द्रिय संबंध परित्याग कर ही जीवात्मा स्वभावसिद्ध मानस ज्ञान के द्वारा, समस्त विषयों का अनुभव करता है, यह बतलाया गया है। "इस आत्मा की देवता उपासना करते हैं, इसी से उन्हें संपूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त है" इत्यादि में, ज्ञानी लोग ऐसे आत्मा को जानते हैं, ऐसा प्रतिपादन करके—"वह संपूर्ण लोक और समस्त भोगों को प्राप्त करता है, जिसने कि ऐसे आत्मस्वरूप का अनुभव कर लिया है-प्रजापति ने ऐसा कहा" इस उपसंहारात्मक वाक्य में आत्माभिज्ञ व्यक्ति की, सर्वलोक और सर्वकाम विशेषित ब्रह्मानुभवात्मक फलावाप्ति होती है, यह निर्णय कर प्रकरण की पूर्ति की गई है। इससे निश्चित होता है कि--निष्पापता आदि जीव ही उक्त प्रकरण में ज्ञातृत्व बतलाया गया है, इस जीव में निष्पापता आदि गुणों की संभावना है दहर वाक्य के अंत में जीव के ही निष्पापता आदि गुण बतलाए गए हैं इसलिए वह जीव ही दहराकाश है। इत्यादि संशय उपस्थित किया । सिद्धान्तः—तत्राह—"आविर्भूतस्वरूपस्तु" इति । पूर्वमनृतति- रोहितापहतपाप्मत्वादिगुणस्वरूपः पश्चाद्विमुक्तकर्मबन्धः शरीरात् समुत्थितः परं ज्योतिरुपसंपन्न आविर्भूतस्वरूपः सन्नपहतपाप्म- त्वादिगुण विशिष्ट स्तत्र प्रजापति वाक्येऽभिधीयते, दहरवाक्येत्वति- रोहित स्वभावापहतपाप्मत्वादिविशिष्ट एव दहराकाशः प्रतीयते । आविर्भूतस्वरूपस्यापि जीवस्यासंभावनीयाः सेतुत्वसर्वलोक विध- रणत्वादयः सत्यशब्द निर्वचनावगतं चेतनाचेतनयोर्नियंतृत्वं दहरा- काशस्य परब्रह्मतां साधयंति । सेतुः सर्वलोकविधरणत्वादय आविर्भूत स्वरूपस्यापि न संभवंतीति—"जगद्व्यापारवर्ज्यम्" इत्यत्रोपपादयिष्यामः । ankurnagpal108@gmail.com

( ५०३ ) उक्त संशय पर समाधान रूप से सूत्रकार "आविर्भूतस्वरूपस्तु" पद प्रस्तुत करते हैं अर्थात् प्रजापति वाक्य में बतलाया गया है कि- जीवात्मा के जो अपहतपाप्मत्व आदि गुण हैं वे मिथ्या ज्ञान से आवृत्त रहते हैं, कर्म बन्धनों के विच्छेद के बाद, शरीर से छूटने पर-परं ज्योति- परमात्मा की प्रप्ति होने पर ही उसे अपना स्वाभाविक प्रकृत स्वरूप प्राप्त होता है, तभी वह अपहतपाप्मत्व आदि गुणों वाला होता है। दहर वाक्य में तो अतिरोहित, सदा एकरस अपहतपाप्मत्वादि गुण वाला दहर बतलाया गया है। आविर्भूत स्वरूप होते हुए भी जीवात्मा में, सेतुत्व, सर्वलोक विधारकत्व आदि विशेषताओं की संभावना नही है। सत्य शब्द के निर्वचन से ज्ञात जड़ चेतन के नियंत्रण की क्षमता, ही, दहराकाश की परब्रह्मता, निश्चित करती है। सेतुत्व, सर्वलोक विधा- रकत्व आदि विशेषताये, आविर्भूत स्वरूप होने पर जीवात्मा में संभव नहीं हैं, यह हम "जगद्व्यापारवर्ज्यम्" सूत्र के प्रसंग में सिद्ध करेंगे। यद्येवम्-दहर वाक्य "अत एष संप्रसादः" इत्यादिना जीव प्रस्ताव किमर्थः ? इतिचेत् तत्राह- यदि ऐसी ही बात है तो, दहर वाक्य में "अतएष संप्रसादः" इत्यादि से, जीव को प्रस्तुत करने का क्या तात्पर्य है ? इस संशय पर कहते हैं। अन्यार्थश्च परामर्शः ।१।३।१६॥ दहराकाशस्यैवापहपाप्मत्वादि जगद्विधरणत्वादिवन्मुक्तस्य तदुपसंपत्त्याऽपहपाप्मत्वादि कल्याणगुणविशिष्ट स्वाभाविकरूप प्राप्ति कथनेन तद्धेतुत्वरूपं परमपुरुषासाधारणं गुणमुपदेष्टुं प्रजा- पति वाक्योक्तस्य जीवस्यात्र परामर्शः । प्रजापति वाक्ये च मुक्ता- त्मस्वरूपयाथात्म्य विज्ञानं दहरविद्योपयोगितयोक्तम्, ब्रह्मप्रेप्सोर्हि जीवात्मनः स्वरूपं च ज्ञातव्यमेव स्वयमपि कल्याण गुण एव संन्ननवधिकातिशयासंख्येय कल्याणगुणगणं परं ब्रह्मानुभविष्यतीति ब्रह्मोपासनफलांतर्गतत्वात् स्वरूप याथात्म्य विज्ञानस्य । "सर्वांश्च ankurnagpal108@gmail.com

( ५०४ ) लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्” “स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन्” इत्यादिकं प्रजापति वाक्ये कीर्त्यमानं फलमपि, दहरविद्याफलमेव । दहराकाश में जैसे निष्पापता, जगद्विधारकत्ता आदि विशेषतायें हैं, वैसे दहरोपासना द्वारा उक्त कल्याणमय गुण विशिष्ट स्वभाव सिद्ध स्वरूप मुक्त पुरुष मे भी, हो सकते हैं, इस बात को निर्णय करने के लिए तथा परम पुरुष के असाधारण गुण ही स्वरूप प्राप्ति के एक मात्र कारण हैं इस उपदेश के लिए, प्रजापति वाक्य में बतलाए गए जीवात्मा के स्वरूप को, इस दहर प्रकरण में प्रस्तुत किया गया है। प्रजापति वाक्य में, मुक्तात्म स्वरूप के याथात्म्य ज्ञान के लिए, दहर विद्या की उपयोगिता बतलाई गई है, ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियो को जीवात्मा का प्रकृत स्वरूप भी अवश्य जानना चाहिए, क्यो कि—जीव स्वयं कल्याणमय गुणो से संपन्न होते हुए भी, निरवधि, निरतिशय कल्याणमय गुणों वाले परब्रह्म का अनुभव करता है। स्व स्वरूप का याथात्म्य ज्ञान भी ब्रह्मो- पासना के फलस्वरूप ही होता है। प्रजापति वाक्य मे जो यह कहा गया कि-“वह समस्त लोक और समस्त काम्यफलो को प्राप्त करता है” “हास्य और क्रीड़ा करते हुए विचरण करता है” यह सब भी दहर विद्या के फलस्वरूप ही होता है। श्रुतेरितिचेत्तदुक्तम् ॥१।३।२०॥ “दहरोऽस्मिन्” इत्यल्पपरिमाण श्रुतिराराग्रोपमितस्य जीवस्यै- वोपपद्यते, न तु सर्वस्माज्ज्यायसो ब्रह्मणः, इति चेत्-तत्र यदुत्तरं वक्तव्यम्, तत्पूर्वमेवोक्तम्-“निचाय्यत्वादेवं” इत्यनेन । अतोदहरा- काशोऽनाघ्राताविद्याद्यशेषदोषगंधः स्वाभाविकनिरतिशय ज्ञानवलै- श्वर्यवीर्यशक्ति तेजः प्रभृत्यपरिमितोदारगुणसागरः पुरुषोत्तमः एव । प्रजापति वाक्यनिर्दिष्टस्तु “घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्ति” इत्येवमादि- भिरवगतकर्मनिमित्तदेह परिग्रहः पश्चात् परंज्योतिरूपसंपद्याविर्भूत अपहतपाप्मत्वादिगुण स्वरूप इति न दहराकाशः । ankurnagpal108@gmail.com

( ५०५ ) यदि कहो कि-दहराकाश की अल्पता के प्रतिपादक "दहरोऽस्मिन् इत्यादि वाक्य में, आरा के अग्रभाग के समान सूक्ष्म जीवात्मा का ही उपपादन किया गया है, सर्वश्रेष्ठ परमात्मा का नहीं ? इस विषय में हमें जो कुछ कहना था वह "निचाय्यत्वादेवम्" सूत्र में ही कह चुके हैं। अविद्या आदि समस्त दोषों से अनाघ्रात, स्वभावसिद्ध निरतिशय ज्ञान- बल-ऐश्वर्य वीर्य-शक्ति-तेज आदि अपरिमित उदार गुणों के सागर पुरु- षोत्तम ही, दहराकाश हैं । "ध्र'ति त्वेवैनं" इत्यादि से ज्ञात होता है कि—जीवात्मा प्रायः प्राक्तनकर्मानुसार देहधारी रहता है, परंज्योति स्वरूप परब्रह्म को जानकर ही, अपहतपाप्मत्व आदि गुणों से संपन्न जैव स्वरूप से अभिव्यक्त होता है । इससे निश्चित होता है कि—प्रजापति वाक्य में जीव का ही निर्देश किया गया है, दहराकाश का नहीं । इतश्चैतदेवम्- इससे भी यह बात स्पष्ट है कि- अनुकृतेस्तस्य च ।१।३।२१॥ तस्य दहराकाशस्य परस्य ब्रह्मणः अनुकारात् अभयपहतपाप्म त्वादिगुणको विमुक्त बंधः प्रत्यगात्मा न दहराकाशः । तदनुकारः तत्साभ्यम् तथाहि प्रत्यगात्मनो विमुक्तस्य परब्रह्मानुकारः श्रूयते- "यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यभुपैति" इति । अतोऽनुकर्त्ता प्रजापति वाक्य निर्दिष्टः अनुकार्यं ब्रह्म दहराकाशः । जीव जब, परब्रह्म दहराकाश के समान अपहपाप्मत्वादि गुणों से संपन्न होकर बंधनविमुक्त होता है, तो दहराकाश नहीं कह सकते । तदनुकार का तात्पर्य होता है तत्समान । विमुक्त जीवात्मा की परब्रह्मानु- कृति निम्नोक्त श्रुति में प्रसिद्ध है--'जब यह दृष्टा ( जीव ) सबके शासक, ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परंपुरुष का साक्षात्कार कर लेता है, उस समय पुण्यपाप से विमुक्त होकर निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता को प्राप्त कर लेता है' इससे निश्चित होता है कि-प्रजापति वाक्य में अनुकर्त्ता ankurnagpal108@gmail.com

जीव का ही उल्लेख है तथा दहराकाश प्रकरण में अनुकार्य ब्रह्म का उल्लेख है। अपिस्मर्यते ॥१।३।२२॥ संसारिणोऽपि मुक्तावस्थायां परमसाम्यापत्ति लक्षणः पर- ब्रह्मानुकारः स्मर्यते "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथंति च" इति । संसारी जीवात्मा की भी मुक्तावस्था में परम साम्यावस्था रूप परब्रह्मानुकारिता, स्मृति में भी बतलाई गई है--"इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे साधर्म्य को प्राप्त हुए पुरुष, न तो सृष्टिकाल में उत्पन्न होते हैं न प्रलयकाल में व्यथित होते हैं।" केचित् "अनुकृतेस्तस्य च" अपिस्मर्यते "इतिसूत्रद्वयमधिकर- णान्तरं" तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति" इत्यस्याः श्रुतेः परब्रह्मपरत्व निर्णयाय प्रवृत्तं वदंति । तत्तु "अदृश्य श्वादि गुणको धर्मोक्तेः" द्युम्वाद्यायतनं स्वशब्दात्" इत्यधिकरण द्वयेन तस्य प्रकरणस्य परब्रह्मविषयत्व प्रतिपादनात्" ज्योतिश्चरणा भिधानात्" इत्यादिषु परस्य ब्रह्मणो भारूपत्वावगतेश्च पूर्वपक्षा- नुत्थानादयुक्तम्, सूत्राक्षर वैरूप्यं च । कोई ( श्री शंकर ) "अनुकृते स्तस्य च" अपिस्मर्यते" इन दो सूत्रों, को, अन्य प्रकरण की "उसके प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होते हैं, उसी से यह सारा जगत प्रकाशित है" इत्यादि श्रुति के परब्रह्मत्व का निर्णायक बतलाते हैं। यह बात कुछ जचती नहीं, क्योंकि-'अदृश्यत्वादि' द्युम्वाद्यायतन "आदि दोनों अधिकरणों में परब्रह्म विषयक प्रतिपादन किया गया है। "ज्योतिश्चरणाभिधान" इत्यादि में भी परब्रह्म के भारूप की अवगति हो जाती है, इसलिए पुनः उसी विषय को यहाँ भी उठाना, अयुक्त है तथा सूत्राक्षरों से विपरीत है।

( ५०७ )

६ प्रमिताधिकरण— शब्दादेव प्रमितः ।१।३।२३॥ कठवल्लीषु श्रूयते—“अंगुष्ठमात्रो पुरुषः मध्य आत्मनि तिष्ठति, ईशानोभूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ।” एतद्वैतत् “अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः, ईशानोभूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः” एतद्वैतत्—“अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदाजनानां हृदये संन्नि- विष्टः तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन् मुंजादिवैषीकां धैर्येण तं विद्याच्छु- क्रममृतम्” इति । तत्रसंदिह्यते—किमयमंगुष्ठमात्र प्रमितः प्रत्यगात्मा, उतपरमात्मा इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? जीवस्यान्य- त्रांगुष्ठमात्रत्वश्रुतेः “प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः, अंगुष्ठमात्रः रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः” . इति । न चान्यत्रो- पासनार्थंतयाऽपि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वं श्रूयते । एवं निश्चिते जीवत्वे ईशानत्वं शरीरेन्द्रियभोग्यभोगोपकरणापेक्षयाऽपि भवि- ष्यति । कठवल्ली की श्रुति है कि—“अंगुष्ठ परिमाण वाला पुरुष आत्मा में अवस्थित है, वही भूत और भविष्य का शासक है, उन्हें जान लेने वह किसी की निन्दा नहीं करता—यही है वह—(जिसके लिए तुमने पूछा था) अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष धूमरहित ज्योति के समान है, वही भूतभविष्य का शासक है, वही आज है और कल भी रहेगा—यही है वह—सबका अंतर्यामी अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला पुरुष, सदैव प्राणियों के हृदय में स्थित है, उसे मूंज से सींक भाँति ( जैसे कि सींक मूंज से भिन्न है ) अपने शरीर से धीरतापूर्वक पृथक् करके देखे, उसी को अमृत स्वरूप समझे ।” अब संशय होता है कि—यह अंगुष्ठ परिमाण वाला प्रमित, जीवा- त्मा है परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा । क्योंकि—अन्य श्रुतियों में जीव को अंगुष्ठ परिमाण वाला कहा गया है—जैसे कि—“प्राणों का ankurnagpal108@gmail.com

( ५०८ ) अधिपति अपने कर्मों से प्रेरित होकर अनेक योनियों में विचरता हुआ, जो कि अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला है, वह सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप, सकल्प और अहंकार से युक्त है।" किसी भी श्रुति में उपासना के लिए, परमात्मा के अंगुष्ठ परिमाण का वर्णन भी नही मिलता । इस प्रकार प्रमित की जीवता निश्चित हो जाने पर-शरीर-इन्द्रिय भोग्य और भोगोपकरण इत्यादि में जीव की शासकता भी निश्चित हो सकती है। सिद्धान्तः—इति प्राप्ते ब्रूमः—शब्दादेव प्रमितः—अंगुष्ठ प्रमितः परमात्मा, कुत. ? "ईशानो भव्यस्य" इति शब्दादेव । न च भूत भव्यस्य सर्वस्येशितृत्वं कर्मपरवशस्य जीवस्योपपद्यते । उक्त संशय पर सिद्धात रूप से "शब्दादेवप्रमित " सूत्र प्रस्तुत किया गया, जिसका तात्पर्य है कि-अंगुष्ट प्रमित परमात्मा है "ईशानो- भूतभव्यस्य" शब्द से ही उसकी परमात्मकता सिद्ध होती है। कर्म परवश जीवात्मा में भूत भविष्य आदि समस्त की शासकता संभव नही है। कथं तर्हि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वमित्यत्राह- परमात्मा की अंगुष्ठ मात्रता कैसे संभव है ? इस पर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥१।३।२४॥ परमात्मन उपासनार्थमुपासक हृदये वर्त्तमानत्वादुपासक हृदय- स्यांगुष्ठ प्रमाणत्वात्तदपेक्षयेदमंगुष्ठ प्रमितत्वमुपपद्यते । जीवस्यापि अंगुष्ठ प्रमितत्वं हृदयांतर्वर्तित्वात्तदपेक्षमेव, तस्याराग्रमात्रत्वश्रुतेः । मनुष्याणामेवोपासकत्व संभावनया, शास्त्रस्यमनुष्याधिकारत्वात् मनुष्य हृदयस्य च तत्तदंगुष्ठ प्रमितत्वात्खरतुरगभुजगादीनामनंगुष्ठ प्रमितस्वेऽपि न कश्चिद्दोषः स्थितं तावदुत्तरत्र समापयिष्यते । मनुष्य का हृदय अंगुष्ठ परिमाण का है, उसमें परमात्मा की उपासना की जाय, इसलिए आयतन के अनुरूप, परमात्मा के अंगुष्ठ परिमाण का वर्णन किया गया है। जीवात्मा के लिए भी जो अंगुष्ठ ankurnagpal108@gmail.com

( ५०६ ) परिमाण का वर्णन मिलता है, वह भी हृदय के परिमाणानुसार ही है, अन्यथा श्रुतियों में तो जीव को आरा के अग्रभाग के समान अतिसूक्ष्म बतलाया गया है । उपासना मनुष्यों से ही संभव हो सकती है, शास्त्र का अधिकार भी मनुष्य का ही बतलाया गया है । मनुष्य का हृदय अपने अपने अंगुष्ठ परिमाण का होता है । गर्दभ घोड़ा सर्प इत्यादि का तो अंगुष्ठ परिमाण का प्रश्न ही नहीं उठता; जीव के अंगुष्ठ परिमाण पर किसी प्रकार की शंका का अवकाश भी नहीं है । इस विषय को अग्रिम अधिकरण में समाप्त करेंगे । ७ देवताधिकरणः- तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ।१।३।२५॥ परस्य ब्रह्मणोंऽगुष्ठप्रमितत्वोपपत्तये मनुष्याधिकारं ब्रह्मोपास- नशास्त्रमित्युक्तम् । तत्प्रसंगेनेदानीं ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्य- धिकारोऽस्ति नास्तीति विचार्यते । किं तावद्युक्तम् ? नास्ति देवा- दीनामधिकार इति, कुतः ? सामर्थ्याभावात्-न हि अशरीराणां देवादीनां विवेकविमोकादि साधनसप्तकानुगृहीत ब्रह्मोपासनोपसंहार- सामर्थ्यमस्ति । न च देवादीनां सशरीत्वे प्रमाणमुपलभामहे । यद्यपि परिनिष्पन्नेऽपि वस्तुनि व्युत्पत्ति संभावनया वेदांतवाक्यानि परे ब्रह्मणि प्रमाणभावमनुभवंति, तथापि देवादीनां विग्रहवत्त्व प्रति- पादन परं न किंचिदपि वाक्यमुपलभ्यते । मंत्रार्थवादास्तु कर्मविधि- शेषतयाऽन्यपरत्वान्न देवादि विग्रह साधने प्रभवंति । कर्मविधयश्च स्वापेक्षितोद्देश्यकारकत्वातिरेकि देवतागतं किमपि न साधयंति । अतएव तासामर्थित्वमपि न संभवति । अतः सामर्थ्यार्थित्वयोरभा- वाद्देवादीनां अनधिकारः- इति । परब्रह्म के अंगुष्ठमात्र परिमाण के प्रतिपादन का एकमात्र अभिप्राय है कि—मनुष्यमात्र का ही ब्रह्मोपासना का अधिकार है, इसी- लिए शास्त्रों में उन्हें ही अधिकारी माना गया है । इसी प्रसंग में विचार ankurnagpal108@gmail.com

( ५१० ) उपस्थित होता है कि-ब्रह्मविद्या (उपासना) में देवता आदि का भी अधिकार है या नहीं ? कह सकते हैं कि नहीं है, क्योंकि देवतादि में सामर्थ्य नहीं है, अशरीरी देवता आदि में विवेक-विमोक आदि सप्त प्रकार की साधनाओं की सहायता से ब्रह्मविद्या को ग्रहण करने का सामर्थ्य ही नहीं है। उन लोगों के शरीरी होने का कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। यद्यपि शब्द द्वारा स्वतः सिद्ध ( क्रिया संबंध रहित ) वस्तु में व्युत्पादन की संभावना से वेदांत वाक्यों को परब्रह्म के संबंध में प्रमाण माना जा सकता है, फिर भी देवताओं के शरीरी होने के प्रमाण कहीं भी नहीं मिलते। मंत्र और अर्थवाद वाक्य भी, जो कि-कर्म विधि के अंगरूप से वर्णित हैं, अन्यार्थ बोधक हैं। देवताओं के शरीर अस्तित्व को प्रमाणित करने में वे भी असमर्थ हैं। कर्मविधि समूहक वाक्य भी, देव- ताओं के संबंध में, कर्मापेक्षित उद्देश्य के प्रतिपादन के अतिरिक्त कुछ और प्रमाणित नहीं कर पाते। इसलिए उनका अर्थित्व भी संभव नहीं है। सामर्थ्य और अर्थित्व के अभाव होने से, देवादिकों का, ब्रह्मविद्या में अनाधिकार सिद्ध होता है। सिद्धान्तः-एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-‘‘तदुपर्य्यपि बादरायणः संभवात्’’-तदुपरि अपि, तद् ब्रह्मोपासनं उपरि-देवादिष्वपि, संभवतीति बादरायणो मन्यते। तेषामर्थित्व सामर्थ्ययोः संभवात् । अर्थित्वंतावद् आध्यात्मिकादिदुर्विषहदुःखाभितापात् परस्मिन् ब्रह्मणि च निरस्तनिखिल दोषगंधेऽनवधिकातिशयासंख्येय कल्याण- गुणगणे निरतिशय भोग्यत्वादिज्ञानाच्च संभवति । सामर्थ्यमपि पटुतरदेहेन्द्रियादिमत्तया संभवति । देहेन्द्रियादिमत्वं च ब्रह्मादीनां सकलोपनिषत्सु सृष्टि प्रकरणेषु उपासनप्रकरणेषु च श्रूयते । तथाहि-‘‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत् तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्’’ इत्यारभ्य-सर्वमचेतनं तेजोवन्नप्रमुखावस्थ्याविशेषवद् व्याकृत्य-‘‘अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’’ इति संकल्प्य ब्रह्मादिस्थावरान्तं चतुर्विधंभूतजातं तत्तत्कर्मोचित्,

( ५११ ) शरीरं तदुचित नामभाक्चायमकरोदित्युक्तम् । एवं सर्वत्र सृष्टि वाक्येषु देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मना चतुर्विधा सृष्टिराम्नायते । उक्त संशय पर सिद्धान्तरूप से उक्त "तदुपर्यपि" आदि सूत्र प्रस्तुत किया जाता है, अर्थात् ब्रह्मोपासना, देवताओं में भी हो सकती है, ऐसा बादरायण का मत है । देवता आदि में अर्थित्व और सामर्थ्य है । दुःसह अध्यात्मिकादि दुःखों से तप्त होने से तथा समस्त दोषों से रहित, निरवधि, निरतिशय, असंख्य कल्याणमय, गुणों से युक्त परब्रह्म में भी निरतिशय भोग सद्भाव का ज्ञान होने से अर्थित्व, और कार्यक्षम उत्कृष्ट देह इन्द्रियादि की विद्यमानता से, उनमें सामर्थ्य भी है । सभी उपनिषदों में सृष्टि और उपासना के प्रकरणों में, ब्रह्मा आदि देवताओं की, देह इन्द्रिय आदि की सत्ता बतलाई गई है । "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह सारा जगत सद् ही था, उसने संकल्प किया अनेक हो जाऊँ उसने तेज की सृष्टि की" इत्यादि से प्रारंभ करके-अव्यक्त तेज आदि समस्त अचेतनों की विशेष अवस्थाओं का विवेचन करके- 'इनमें जीवात्मरूप से प्रविष्ट होकर नामरूप की अभिव्यक्ति करूँगा" ऐसा संकल्प के उस परमात्मा ने ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक चतुर्विध भूतवर्ग के विशेष कर्मा- नुसार उनके शरीर और नामरूप को विभक्त किया; ऐसा बतलाया

( ५१२ ) के योग्य देह इन्द्रिय आदि के संबंध निबंधन से ही, कल्पित होता है। जैसा कि वर्णन मिलता है—"देवता और असुर दोनों ने ही, परंपरा से जान लिया उन्होंने कहा—देवों के राजा इन्द्र तथा असुरों के राजा विरोचन, दोनों आपस में स्पर्धा करते हुए, हाथों में समिधायें लेकर, प्रजापति के पास पहुँचे, उन्होंने बत्तीस साल तक ब्रह्मचर्य का पालन किया, तब उनसे प्रजापति ने कहा—"इत्यादि से, देवताओं के देह इन्द्रिय आदि की, स्पष्ट प्रतीत हो रही है। कर्मविधिविशेषभूत मंत्रार्थवादेष्वपि "वज्रहस्तः पुरंदरः" "तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत्" इत्यादिभिःप्रतीयमानं विग्रहादिमत्वं प्रमा- णांतराविरुद्धं तत्प्रमेयमेव । न चानुष्ठेयार्थप्रकाशनस्तुतिपरत्वाभ्यां प्रतीयमानार्थान्तरा विवक्षा शक्यते वक्तुम् । स्तुत्याद्युपयोगित्वात्तेन विना स्तुत्याद्यनुपपत्तेश्च । गुणकथनेन हि स्तुतित्वम् । गुणाना- मसद्भावे स्तुत्वमेव हीयते । न चासतागुणेन कथितेन परोचना जायते । अतः कर्मं परोचयंतो गुणसद्भावं बोधयंत एवार्थंवादाः । कर्मविधि के विशेष अंग मंत्र और अर्थवाद के—"वज्रहस्त पुरंदर" इन्द्र ने वज्र उठाया" इत्यादि वाक्यों से भी देह के अस्तित्व की प्रतीति होतीहै। यह वर्णन प्रमाणान्तरों के विरुद्ध भी नहीं है, इसलिए प्रामा- णिक ही है। मंत्र और अर्थवाद वाक्य, कर्मानुष्ठान और स्तुतिपरक ही हैं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, अन्यार्थ भी, स्तुतिवाद के उपयोगी ही होते हैं; उक्त वाक्यों की अर्थान्तर विविक्षा न मानने से, स्तुतिवाद उपपन्न ही नहीं हो सकता । गुणकथन को ही तो स्तुति कहते हैं, यदि गुणों का ही असद्भाव हो जायेगा तो, स्तुतित्व भी नष्ट हो जायेगा असद्गुणों के कथन से तो लोगों की प्रवृत्ति उद्दीप्त हो नहीं सकती । कर्म के विषय में रोचक अर्थवाद ही; वर्णनीय गुणों के, सद्भाव के द्योतक होते हैं। मन्त्राश्च कर्मसु विनियुक्तास्तत्रतत्र किंचित्करवायानुष्ठेयमर्थं प्रकाशयंतो देवतादिगतविग्रहादिगुणविशेषमभिदधत एव तत्र किंचित् ankurnagpal108@gmail.com