श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१२ ) के योग्य देह इन्द्रिय आदि के संबंध निबंधन से ही, कल्पित होता है। जैसा कि वर्णन मिलता है—"देवता और असुर दोनों ने ही, परंपरा से जान लिया उन्होंने कहा—देवों के राजा इन्द्र तथा असुरों के राजा विरोचन, दोनों आपस में स्पर्धा करते हुए, हाथों में समिधायें लेकर, प्रजापति के पास पहुँचे, उन्होंने बत्तीस साल तक ब्रह्मचर्य का पालन किया, तब उनसे प्रजापति ने कहा—"इत्यादि से, देवताओं के देह इन्द्रिय आदि की, स्पष्ट प्रतीत हो रही है। कर्मविधिविशेषभूत मंत्रार्थवादेष्वपि "वज्रहस्तः पुरंदरः" "तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत्" इत्यादिभिःप्रतीयमानं विग्रहादिमत्वं प्रमा- णांतराविरुद्धं तत्प्रमेयमेव । न चानुष्ठेयार्थप्रकाशनस्तुतिपरत्वाभ्यां प्रतीयमानार्थान्तरा विवक्षा शक्यते वक्तुम् । स्तुत्याद्युपयोगित्वात्तेन विना स्तुत्याद्यनुपपत्तेश्च । गुणकथनेन हि स्तुतित्वम् । गुणाना- मसद्भावे स्तुत्वमेव हीयते । न चासतागुणेन कथितेन परोचना जायते । अतः कर्मं परोचयंतो गुणसद्भावं बोधयंत एवार्थंवादाः । कर्मविधि के विशेष अंग मंत्र और अर्थवाद के—"वज्रहस्त पुरंदर" इन्द्र ने वज्र उठाया" इत्यादि वाक्यों से भी देह के अस्तित्व की प्रतीति होतीहै। यह वर्णन प्रमाणान्तरों के विरुद्ध भी नहीं है, इसलिए प्रामा- णिक ही है। मंत्र और अर्थवाद वाक्य, कर्मानुष्ठान और स्तुतिपरक ही हैं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, अन्यार्थ भी, स्तुतिवाद के उपयोगी ही होते हैं; उक्त वाक्यों की अर्थान्तर विविक्षा न मानने से, स्तुतिवाद उपपन्न ही नहीं हो सकता । गुणकथन को ही तो स्तुति कहते हैं, यदि गुणों का ही असद्भाव हो जायेगा तो, स्तुतित्व भी नष्ट हो जायेगा असद्गुणों के कथन से तो लोगों की प्रवृत्ति उद्दीप्त हो नहीं सकती । कर्म के विषय में रोचक अर्थवाद ही; वर्णनीय गुणों के, सद्भाव के द्योतक होते हैं। मन्त्राश्च कर्मसु विनियुक्तास्तत्रतत्र किंचित्करवायानुष्ठेयमर्थं प्रकाशयंतो देवतादिगतविग्रहादिगुणविशेषमभिदधत एव तत्र किंचित् ankurnagpal108@gmail.com