श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१३ ) कुर्वन्ति, अन्यथा इन्द्रादि स्मृत्यनुपपत्तेः । न च निर्विशेषा देवता धियमधिरोहति । तत्र प्रमाणान्तराप्राप्तान्गुणान् स्वयमेव बोध- यित्वा तैः कर्मं प्ररोचयंति । गुण विशिष्टं वा प्रकाशयंति, प्राप्तां- श्चानूद्य तैः प्ररोचन प्रकाशने कुर्वन्ति, विरुद्धत्वे तु तद्वाचिभिः शब्दैरविरुद्धान् गुणान् लक्षयित्वा कुर्वन्ति । कर्मविधेेश्च देवताया ऐश्वर्यमपेक्षितमेव । कामिनः कर्त्तव्यतया कर्मविधीयमानं स्वयं क्षण प्रध्वंसि कालांतरभाविनः फलस्य स्वर्गादेः साधकमपेक्षते । मंत्र समूह भी, कर्म के विनियुक्त विशेष विशेष विषयों में, कुछ न कुछ उपकार साधन के लिए ही, कर्मानुष्ठेय अर्थ का प्रतिपादन करते हैं । मंत्र समूह देवादिकों के शरीरादि गुणविशेषों का प्रतिपादन करके ही, उपकारी होते हैं अन्यथा कार्यकाल में इन्द्रादि का स्मरण ही नहीं हो सकता । निर्विशेष ( शरीरादि विशेषभाव रहित ) केवल शब्दमय देवता, कभी बुद्ध्यारूढ़ ( स्मृत ) नहीं हो सकते । अन्य प्रमाणों जो गुणवर्णन पाया जाता है, वह स्वयं उद्बोधक या रुचिवर्द्धक होता है अथवा गुण- विशिष्ट कर्मविशेष का प्रतिपादक होता है । जो गुण प्रमाणान्तरों में मिलते हैं, वे सब अनुवाद या पुनरुल्लेख मात्र हैं, जो कि साधकों में, उत्कट श्रद्धा और कर्म स्वरूप का प्रकाशन करते हैं । ( प्रमाणान्तरों के साथ ) विरुद्धता उपस्थित होने पर गुणवाचक शब्दों से अविरुद्ध गुण समूहों को, लक्षित करके प्रतिपादन किया गया है । देवताओं का ऐश्वर्य या विभूति भी, कर्म सापेक्ष होते हैं । सकाम साधकों द्वारा, कर्त्तव्यरूप से विधीयमान कर्म, स्वयं क्षणभंगुर होते हैं, वे कालांतर में स्वर्गादिफल के रूप में, साधक की साधना के अनुसार प्रतिफलित होते हैं । मंत्रार्थवादयोश्च-“वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भाग- धेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति”-“यदनेनहविषाऽशास्ते तद- श्यात्तद्ध्यात्तदस्मै देवाराधन्ताम्” इत्यादिषु देवताया कर्मणाऽ- राधितायाः फलदायित्वं तदनुगुणं चैश्वर्यं प्रतीयमानमपेक्षितत्वेन वाक्यार्थे समन्वीयते । ankurnagpal108@gmail.com