श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६६ ) भूमि में गड़े हुए धन को, भूमि पर घूमते फिरते हुए भी न देख पाते हैं न जान पाते हैं, यह रहस्य भी वैसा ही है । सेयमेवमंतरात्मत्वेन स्थितस्य दहराकाशस्योपरि तन्नियमतानां सर्वासां प्रजानामजानतीनां सर्वदा गतिस्य दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । तथाहि अन्यत्र परस्यब्रह्मणोऽन्तरात्मतयाऽवस्थितस्य स्वनियम्याभिस्स्वस्मिन् वर्त्तमानाभिः प्रजाभिरवेदनं दृष्टम् । यथा अंतर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद, यस्यात्मा शरीरं, य आत्मानमंतरौ यमयति” इति “अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतश्रोता” इति च । मामूदन्यत्र दर्शनम्, स्वयमेवत्वियं निधिदृष्टान्तावगत परमपुरुषार्थं भावस्यास्य हृदयस्थस्योपरितदाधा- रतऽहरहस्सर्वदा सर्वासांप्रजानामजानातोना गतिस्य परब्रह्मत्वे पर्याप्तं लिंगम् । अन्तरात्मा रूप से अवस्थित दहराकाश के ऊपर की जो स्थिति है वह भी, उसी के नियमन पर आधारित है, यही दहराकाश की पर- ब्रह्मता का प्रमाण है । अन्यान्य श्रुतिवाक्यों में भी, परब्रह्म की अन्तरात्मा रूप से स्थिति और नियामकता, तथा जीवात्मा की अल्पज्ञता का वर्णन किया गया है—जैसे कि—अन्तर्यामी ब्राह्मण में—‘जो आत्मा में ही सदा स्थित है, पर आत्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा ही उसका शरीर है, वह अन्दर बैठा ही आत्मा का संयमन करता है,’’ वह अदृष्ट होकर भी द्रष्टा तथा अश्रुत होकर भी श्रोता है’’ इत्यादि । इससे अधिक अब और प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है । निधि के दृष्टांत से जिसकी परपुरुषा- र्थता बतलाई गई, हृदयस्थ उस दहराकाश के ऊपर ही ऊपर सदा वर्त्तमान जीवात्माओं की, उसकी ओर होने वाली गति ही, दहराकाश की परब्रह्मता का पर्याप्त प्रमाण है । इतश्च दहराकाशः परब्रह्म—दहराकाश इसलिए भी परब्रह्म है कि— धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ।१।३।१५॥ “अथ य आत्मा” इति प्रकृतं दहराकाशं निर्दिश्य “स सेतु- ankurnagpal108@gmail.com