भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४६७ ) विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय” इत्यस्मिञ्जगद्विधरणं श्रूयमाणं दहराकाशस्य परब्रह्मतां गमयति । जगद् विधरणं हि परस्यब्रह्मणो महिमा “एष सर्वेश्वर एष सर्वभूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्वि- धरण एषां लोकानमसंभेदाय” इति “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” इत्यादिभ्यः । स चायं तस्य परस्य ब्रह्मणो धृत्याख्यो महिमाऽस्मिन् दहराकाश उपलभ्यते; अतो दहराकाश परब्रह्म । “जो आत्मा में” इत्यादि में दहराकाश के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करके—‘इस समस्त जगत के संभेद अर्थात् सांकर्य का निवारण करने वाला वह सेतु है” इत्यादि में जो जगद् धारकता बतलाई गई है, उससे दहराकाश की, परब्रह्मता ज्ञात होती है । परब्रह्म की महिमा की बतलाने वाली जगद्धारकता “यही सर्वेश्वर-भूताधिपति-भूतपालक और जगत् की मर्यादा की रक्षा करने वाले सेतु हैं, “हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही सूर्य और चंद्र स्थित रहते हैं” इत्यादि वाक्यों से भी ज्ञात होती है । जगद्धारकता रूप परब्रह्म की महिमा, दहराकाश में भी उपलब्ध है, इसलिए भी दहराकाश, परब्रह्म है । प्रसिद्धेश्च ।१।३।१६॥ आकाशशब्दश्च परस्मिन् ब्रह्मणि प्रसिद्धः “को वा ह्येवान्यात् कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनंदो न स्यात्”—“सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यंते” इत्यादिषु; अपहतपाप्मत्वादि- गुण सनाथा प्रसिद्धिर्भूताकाश प्रसिद्धेर्बलीयसी इत्यभिप्रायः । “यह आकाश यदि आनंद स्वरूप न होता तो, आनंद की चेष्टायें कौन कर सकता ?” सारे ही प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं” इत्यादि वाक्यों में प्रयुक्त आकाश शब्द, परब्रह्म के लिए प्रसिद्ध है । निष्पापता आदि गुणों से युक्त जो प्रसिद्धि है, वही भूताकाश से, दहराकाश की श्रेष्ठता की द्योतिका है । ankurnagpal108@gmail.com