श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६८ ) ‥ एवं तावद्दहराकाशस्य भूताकाशत्वं प्रतिक्षिप्तम् । अथेदानीं दहराकाशस्य प्रत्यगात्मत्वमाशंक्य, निराकर्तुमुपक्रमते । अब तक दहराकाश की, भूताकाशता का निराकरण किया गया । अब आगे दहराकाश की जीवात्मकता की आशंका करके, उसका निरा- करण करते हैं— इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ।१।३।१७॥ यदुक्तं वाक्य शेषवशाद् दहराकाशः परंब्रह्मेति, तदयुक्तम्; वाक्यशेषे परमादितरस्य जीवस्यैव साक्षात् परामर्शात् “अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेन रूपेणा- भिनिष्पद्यते एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म” इति । यद्यपि “दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः” इति हृदयपुंडरीक मध्यव- र्त्तितयोपदिष्टस्याकाशस्योपमानोपमेयभावाद्यसंभवाद् भूताकाशत्वं न संभवति, तथापि वाक्यशेषवशात् प्रत्यगात्मत्वं युक्तमाश्रयितुम् । आकाशशब्दोऽपि प्रकाशादियोगाज्जीव एव वर्त्तिष्यत इति चेत्— अत्रोत्तरं नासम्भवात्–इति । नायं जीवः, न हि अपहतपाप्मत्वादयो गुणाः जीवे संभवंति । जो यह कहा कि—अंतिमवाक्य से ज्ञात होता है कि-दहराकाश परब्रह्म है, सो कथन ठीक नहीं, उसमें तो परमात्मा से भिन्न जीवात्मा का ही स्पष्ट उल्लेख प्रतीत होता है-जैसे कि-“यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परंज्योति को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त करता है यही अमृत-अभय-और ब्रह्मस्वरूप है ।” इत्यादि यद्यपि-“दहर के अंदर का आकाश” इत्यादि में उल्लेख्य आकाश का वाह्याकाश के साथ उपमानोपमेय भाव संभव नहीं है, फिर भी हृदय पुंडरीक के मध्यवर्ती दहरकाश की भूताकाशता हो सकती है यह ठीक है, किंतु वाक्य शेष के अनुसार उसे जीवात्मा मानना उचित है । प्रकाश- मयता आदि गुणों से संबद्ध होने से आकाश शब्द जीव वाची ही हो सकता है । ankurnagpal108@gmail.com