भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४१५ ) निरपेक्षं पर्याप्तं लिंगमित्याह-लिंग च इति । निषादस्थपति न्याया- च्च षष्ठी समासात् समानाधिकरण समासो न्याय्यः । यदि कहो कि-ये दोनों ही दहराकाश की ब्रह्मात्मकता को सिद्ध करने वाले हैं, यह कैसे जाना ? सो इनका ऐसा ही वर्णन मिलता है । सभी जीव, सुषुप्ति अवस्था में परब्रह्म में प्रविष्ट होते हैं, ऐसा भी वर्णन मिलता है- 'हे सौम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सारी प्रजा, नित्य, सद्ब्रह्म से संपन्न होकर, यह नहीं जान पाती कि-वह सद्ब्रह्म से संलग्न है तथा सद्ब्रह्म से लौटने पर भी यह नहीं जान पाती कि-सद्ब्रह्म के निकट से लौटे हैं" इस प्रकार ब्रह्मलोक शब्द परब्रह्म के लिए प्रयुक्त देखा जाता है।" उसने कहा हे सम्राट ! यही ब्रह्मलोक है" इत्यादि ही ब्रह्म दर्शन संबंधी पर्याप्त प्रमाण हैं। प्रलय काल की तरह सुषुप्ति अवस्था में भी, दहराकाश में अवस्थान करने पर, जीवों के आत्यंतिक दुःख का अभाव हो जाता है, ऐसा श्रुतियों का वचन है। इसी से दहराकाश की ब्रह्मरूपता