श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०० ) वाक्य को ऐतिह्य (जनश्रुति) के रूप श्रवण करके इन्द्र, अन्वेषणीय आत्म स्वरूप की जिज्ञासा से प्रजापति के पास गए। प्रजापति ने जिज्ञासु की योग्यता की परीक्षा के लिए क्रमशः जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थात्रय संपन्न सशरीर जीवात्मा का उपदेश देकर देखा कि, इन्द्र पर उपदिष्ट विषयों में भोग्य का कोई असर नहीं हुआ तब, विशुद्ध आत्मस्वरूप उपदेश योग्य इन्द्र से उन्होंने- "हे मघवन् ! यह शरीर मर्त्य और मृत्यु ग्रस्त है, यही अशरीरी अमृत आत्मा का आश्रय स्थल है" इत्यादि से शरीर की अधिष्ठाज्ञता, आत्मा की अधिष्ठातृता तथा अशरीर आत्मा की अमृत स्वरूपता बतलाकर- "शरीरी रहते हुए दुःख सुख का अंत नहीं होता, सदा के लिए शरीर के समाप्त हो जाने पर सुख दुःख का स्पर्श नहीं होता।" इस श्रुति से पुण्यपापमय कर्मोत्पादित, शरीर धारी की व्यक्ति के कर्मानुसार सुख दुःख आदि भोगों के ज्ञापन के लिए, शरीर की समाप्ति पर, सुख दुःख का प्रभाव बतलाकर- "यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परं ज्योतिरूपता को प्राप्त कर अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।" इत्यादि में शरीर विमुक्त जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश दिया। “स उत्तमः पुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा, यानैर्वा, ज्ञातिभिर्वा, नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्” इति प्राप्यस्य परस्य ज्योतिषः पुरुषोत्तमत्वम्, निवृत्तितिरोधानस्य परं ज्योतिरुपसंपन्नस्य प्रत्यगात्मनो ब्रह्मलोके यथेष्टभोगावाप्तिम् प्रियाप्रियाविमुक्तकर्मनिमित्तशरीराद्यपुरुषार्थनिनुसंधानं चाभिधाय- “स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमस्मिन् शरीरे प्राणो युक्तः” इति यथोक्त स्वरूपस्यैव संसारदशायां कर्मतंत्रम् शरीर योगं युग्यशकटयोगदृष्टांतेनाभिधाय-अथ यत्रैदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः सः चक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गंधायघ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ वो वेदेदं शृण्वानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम्, अथ यो ankurnagpal108@gmail.com