श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०१ ) वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः” इति चक्षुरादिनां करणात्वं, रूपादीनां ज्ञेयत्वमस्य च ज्ञातृत्वं प्रदर्श्य तत एव शरीरे- न्द्रियेभ्योऽस्य व्यतिरेकमुपपाद्य “स वा एष एतेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन्न्मते य एते ब्रह्मलोके” इति तस्यैव विधूतकर्मनिमित्त शरीरेन्द्रियस्य मनः शब्दाभिहितेन दिव्येन स्वाभाविकेन ज्ञानेन सर्वकामानुभवमुक्तवा “तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषां सर्वे च लोका आप्ताः सर्वे च कामाः” इत्येवंविधमात्मानं ज्ञानिनो जानंतीत्यभिधाय “सर्वांश्चलोकान्नाप्नोति सर्वांश्चकामान्यस्त- मात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच” इत्येवंविधमात्मानं विदुषः सर्वलोकसर्वकामावाप्त्युपलक्षितं ब्रह्मानुभवं फलमभिधायोप- संहृतम् । अतस्तत्रापहतपाप्मत्वादि गुणको ज्ञातव्यतया प्रक्रान्तो जीव एवेत्यवगतम् । अतो जीवस्यापहतपाप्मत्वादयः संभवंति। अतो दहरवाक्यशेषे श्रूयमाणस्य जीवस्यापहपाप्मत्वादिगुणसंभवात् स एव दहराकाश इति निश्चीयते इति चेत् इति । वह उत्तम पुरुष, उस अवस्था में, हंसता, खेलता, स्त्रीयान, और ज्ञाति जनों के साथ रमण करता हुआ, मानव देह को भुलाकर विचरण करता है” इस वाक्य में प्राप्य, परंज्योतिषरूप पुरुषोत्तमत्व, तथा अविद्याकृत स्वरूप तिरोधान निवृत्ति के उपरांत, परंज्योतिसंपन्न जीवात्मा की, ब्रह्मलोक में यथेष्ट भोगरवाप्ति, एवं प्रिय अप्रिय संयोग सहकृत कर्म से समुत्पन्न शरीरादि का अपुरुषार्थत्व वतलाकर-“जैसे कि घोड़ा या बैल गाड़ी से जुता रहता है, वैसे ही यह प्राण इस शरीर में जुटा हुआ है” इस क्षुद्र शकट के दृष्टांत द्वारा, जीव की संसार दशा में कर्माधीन शरीर संबंध की पुष्टि करके-“जिसमें यह चक्षु द्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है, उसके रूप गुण के लिए नेत्रेन्द्रिय है, गंध ग्रहण के लिए नासिका है। जो ऐसा समझता है कि मैं शब्द बोलूं वही आत्मा है उसके शब्दोच्चारण के लिए वागिन्द्रिय है, जो ऐसा जानता है कि मैं शब्द श्रवण करूं वह भी आत्मा है, उसके श्रवण के लिए ankurnagpal108@gmail.com