श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०२ ) श्रवणेन्द्रिय है। जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ वह आत्मा है, मन उसका दिव्य नेत्र है ।" इत्यादि में चक्षु आदि इन्द्रियों की करणता, रूप आदि विषयों की ज्ञेयता, तथा जीव की ज्ञातृता बतलाकर-शरीरादि से उसकी भिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। "जो ये भोग इस ब्रह्मलोक में हैं उन्हे यह जीव मनोमय दिव्य चक्षु द्वारा देखता हुआ रमण करता है" इस श्रुति में कर्मजन्य शरीरेन्द्रिय संबंध परित्याग कर ही जीवात्मा स्वभावसिद्ध मानस ज्ञान के द्वारा, समस्त विषयों का अनुभव करता है, यह बतलाया गया है। "इस आत्मा की देवता उपासना करते हैं, इसी से उन्हें संपूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त है" इत्यादि में, ज्ञानी लोग ऐसे आत्मा को जानते हैं, ऐसा प्रतिपादन करके—"वह संपूर्ण लोक और समस्त भोगों को प्राप्त करता है, जिसने कि ऐसे आत्मस्वरूप का अनुभव कर लिया है-प्रजापति ने ऐसा कहा" इस उपसंहारात्मक वाक्य में आत्माभिज्ञ व्यक्ति की, सर्वलोक और सर्वकाम विशेषित ब्रह्मानुभवात्मक फलावाप्ति होती है, यह निर्णय कर प्रकरण की पूर्ति की गई है। इससे निश्चित होता है कि--निष्पापता आदि जीव ही उक्त प्रकरण में ज्ञातृत्व बतलाया गया है, इस जीव में निष्पापता आदि गुणों की संभावना है दहर वाक्य के अंत में जीव के ही निष्पापता आदि गुण बतलाए गए हैं इसलिए वह जीव ही दहराकाश है। इत्यादि संशय उपस्थित किया । सिद्धान्तः—तत्राह—"आविर्भूतस्वरूपस्तु" इति । पूर्वमनृतति- रोहितापहतपाप्मत्वादिगुणस्वरूपः पश्चाद्विमुक्तकर्मबन्धः शरीरात् समुत्थितः परं ज्योतिरुपसंपन्न आविर्भूतस्वरूपः सन्नपहतपाप्म- त्वादिगुण विशिष्ट स्तत्र प्रजापति वाक्येऽभिधीयते, दहरवाक्येत्वति- रोहित स्वभावापहतपाप्मत्वादिविशिष्ट एव दहराकाशः प्रतीयते । आविर्भूतस्वरूपस्यापि जीवस्यासंभावनीयाः सेतुत्वसर्वलोक विध- रणत्वादयः सत्यशब्द निर्वचनावगतं चेतनाचेतनयोर्नियंतृत्वं दहरा- काशस्य परब्रह्मतां साधयंति । सेतुः सर्वलोकविधरणत्वादय आविर्भूत स्वरूपस्यापि न संभवंतीति—"जगद्व्यापारवर्ज्यम्" इत्यत्रोपपादयिष्यामः । ankurnagpal108@gmail.com