भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 565

( ५०३ ) उक्त संशय पर समाधान रूप से सूत्रकार "आविर्भूतस्वरूपस्तु" पद प्रस्तुत करते हैं अर्थात् प्रजापति वाक्य में बतलाया गया है कि- जीवात्मा के जो अपहतपाप्मत्व आदि गुण हैं वे मिथ्या ज्ञान से आवृत्त रहते हैं, कर्म बन्धनों के विच्छेद के बाद, शरीर से छूटने पर-परं ज्योति- परमात्मा की प्रप्ति होने पर ही उसे अपना स्वाभाविक प्रकृत स्वरूप प्राप्त होता है, तभी वह अपहतपाप्मत्व आदि गुणों वाला होता है। दहर वाक्य में तो अतिरोहित, सदा एकरस अपहतपाप्मत्वादि गुण वाला दहर बतलाया गया है। आविर्भूत स्वरूप होते हुए भी जीवात्मा में, सेतुत्व, सर्वलोक विधारकत्व आदि विशेषताओं की संभावना नही है। सत्य शब्द के निर्वचन से ज्ञात जड़ चेतन के नियंत्रण की क्षमता, ही, दहराकाश की परब्रह्मता, निश्चित करती है। सेतुत्व, सर्वलोक विधा- रकत्व आदि विशेषताये, आविर्भूत स्वरूप होने पर जीवात्मा में संभव नहीं हैं, यह हम "जगद्व्यापारवर्ज्यम्" सूत्र के प्रसंग में सिद्ध करेंगे। यद्येवम्-दहर वाक्य "अत एष संप्रसादः" इत्यादिना जीव प्रस्ताव किमर्थः ? इतिचेत् तत्राह- यदि ऐसी ही बात है तो, दहर वाक्य में "अतएष संप्रसादः" इत्यादि से, जीव को प्रस्तुत करने का क्या तात्पर्य है ? इस संशय पर कहते हैं। अन्यार्थश्च परामर्शः ।१।३।१६॥ दहराकाशस्यैवापहपाप्मत्वादि जगद्विधरणत्वादिवन्मुक्तस्य तदुपसंपत्त्याऽपहपाप्मत्वादि कल्याणगुणविशिष्ट स्वाभाविकरूप प्राप्ति कथनेन तद्धेतुत्वरूपं परमपुरुषासाधारणं गुणमुपदेष्टुं प्रजा- पति वाक्योक्तस्य जीवस्यात्र परामर्शः । प्रजापति वाक्ये च मुक्ता- त्मस्वरूपयाथात्म्य विज्ञानं दहरविद्योपयोगितयोक्तम्, ब्रह्मप्रेप्सोर्हि जीवात्मनः स्वरूपं च ज्ञातव्यमेव स्वयमपि कल्याण गुण एव संन्ननवधिकातिशयासंख्येय कल्याणगुणगणं परं ब्रह्मानुभविष्यतीति ब्रह्मोपासनफलांतर्गतत्वात् स्वरूप याथात्म्य विज्ञानस्य । "सर्वांश्च ankurnagpal108@gmail.com