भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५०४ ) लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्” “स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन्” इत्यादिकं प्रजापति वाक्ये कीर्त्यमानं फलमपि, दहरविद्याफलमेव । दहराकाश में जैसे निष्पापता, जगद्विधारकत्ता आदि विशेषतायें हैं, वैसे दहरोपासना द्वारा उक्त कल्याणमय गुण विशिष्ट स्वभाव सिद्ध स्वरूप मुक्त पुरुष मे भी, हो सकते हैं, इस बात को निर्णय करने के लिए तथा परम पुरुष के असाधारण गुण ही स्वरूप प्राप्ति के एक मात्र कारण हैं इस उपदेश के लिए, प्रजापति वाक्य में बतलाए गए जीवात्मा के स्वरूप को, इस दहर प्रकरण में प्रस्तुत किया गया है। प्रजापति वाक्य में, मुक्तात्म स्वरूप के याथात्म्य ज्ञान के लिए, दहर विद्या की उपयोगिता बतलाई गई है, ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियो को जीवात्मा का प्रकृत स्वरूप भी अवश्य जानना चाहिए, क्यो कि—जीव स्वयं कल्याणमय गुणो से संपन्न होते हुए भी, निरवधि, निरतिशय कल्याणमय गुणों वाले परब्रह्म का अनुभव करता है। स्व स्वरूप का याथात्म्य ज्ञान भी ब्रह्मो- पासना के फलस्वरूप ही होता है। प्रजापति वाक्य मे जो यह कहा गया कि-“वह समस्त लोक और समस्त काम्यफलो को प्राप्त करता है” “हास्य और क्रीड़ा करते हुए विचरण करता है” यह सब भी दहर विद्या के फलस्वरूप ही होता है। श्रुतेरितिचेत्तदुक्तम् ॥१।३।२०॥ “दहरोऽस्मिन्” इत्यल्पपरिमाण श्रुतिराराग्रोपमितस्य जीवस्यै- वोपपद्यते, न तु सर्वस्माज्ज्यायसो ब्रह्मणः, इति चेत्-तत्र यदुत्तरं वक्तव्यम्, तत्पूर्वमेवोक्तम्-“निचाय्यत्वादेवं” इत्यनेन । अतोदहरा- काशोऽनाघ्राताविद्याद्यशेषदोषगंधः स्वाभाविकनिरतिशय ज्ञानवलै- श्वर्यवीर्यशक्ति तेजः प्रभृत्यपरिमितोदारगुणसागरः पुरुषोत्तमः एव । प्रजापति वाक्यनिर्दिष्टस्तु “घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्ति” इत्येवमादि- भिरवगतकर्मनिमित्तदेह परिग्रहः पश्चात् परंज्योतिरूपसंपद्याविर्भूत अपहतपाप्मत्वादिगुण स्वरूप इति न दहराकाशः । ankurnagpal108@gmail.com