श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०५ ) यदि कहो कि-दहराकाश की अल्पता के प्रतिपादक "दहरोऽस्मिन् इत्यादि वाक्य में, आरा के अग्रभाग के समान सूक्ष्म जीवात्मा का ही उपपादन किया गया है, सर्वश्रेष्ठ परमात्मा का नहीं ? इस विषय में हमें जो कुछ कहना था वह "निचाय्यत्वादेवम्" सूत्र में ही कह चुके हैं। अविद्या आदि समस्त दोषों से अनाघ्रात, स्वभावसिद्ध निरतिशय ज्ञान- बल-ऐश्वर्य वीर्य-शक्ति-तेज आदि अपरिमित उदार गुणों के सागर पुरु- षोत्तम ही, दहराकाश हैं । "ध्र'ति त्वेवैनं" इत्यादि से ज्ञात होता है कि—जीवात्मा प्रायः प्राक्तनकर्मानुसार देहधारी रहता है, परंज्योति स्वरूप परब्रह्म को जानकर ही, अपहतपाप्मत्व आदि गुणों से संपन्न जैव स्वरूप से अभिव्यक्त होता है । इससे निश्चित होता है कि—प्रजापति वाक्य में जीव का ही निर्देश किया गया है, दहराकाश का नहीं । इतश्चैतदेवम्- इससे भी यह बात स्पष्ट है कि- अनुकृतेस्तस्य च ।१।३।२१॥ तस्य दहराकाशस्य परस्य ब्रह्मणः अनुकारात् अभयपहतपाप्म त्वादिगुणको विमुक्त बंधः प्रत्यगात्मा न दहराकाशः । तदनुकारः तत्साभ्यम् तथाहि प्रत्यगात्मनो विमुक्तस्य परब्रह्मानुकारः श्रूयते- "यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यभुपैति" इति । अतोऽनुकर्त्ता प्रजापति वाक्य निर्दिष्टः अनुकार्यं ब्रह्म दहराकाशः । जीव जब, परब्रह्म दहराकाश के समान अपहपाप्मत्वादि गुणों से संपन्न होकर बंधनविमुक्त होता है, तो दहराकाश नहीं कह सकते । तदनुकार का तात्पर्य होता है तत्समान । विमुक्त जीवात्मा की परब्रह्मानु- कृति निम्नोक्त श्रुति में प्रसिद्ध है--'जब यह दृष्टा ( जीव ) सबके शासक, ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परंपुरुष का साक्षात्कार कर लेता है, उस समय पुण्यपाप से विमुक्त होकर निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता को प्राप्त कर लेता है' इससे निश्चित होता है कि-प्रजापति वाक्य में अनुकर्त्ता ankurnagpal108@gmail.com