भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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जीव का ही उल्लेख है तथा दहराकाश प्रकरण में अनुकार्य ब्रह्म का उल्लेख है। अपिस्मर्यते ॥१।३।२२॥ संसारिणोऽपि मुक्तावस्थायां परमसाम्यापत्ति लक्षणः पर- ब्रह्मानुकारः स्मर्यते "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथंति च" इति । संसारी जीवात्मा की भी मुक्तावस्था में परम साम्यावस्था रूप परब्रह्मानुकारिता, स्मृति में भी बतलाई गई है--"इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे साधर्म्य को प्राप्त हुए पुरुष, न तो सृष्टिकाल में उत्पन्न होते हैं न प्रलयकाल में व्यथित होते हैं।" केचित् "अनुकृतेस्तस्य च" अपिस्मर्यते "इतिसूत्रद्वयमधिकर- णान्तरं" तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति" इत्यस्याः श्रुतेः परब्रह्मपरत्व निर्णयाय प्रवृत्तं वदंति । तत्तु "अदृश्य श्वादि गुणको धर्मोक्तेः" द्युम्वाद्यायतनं स्वशब्दात्" इत्यधिकरण द्वयेन तस्य प्रकरणस्य परब्रह्मविषयत्व प्रतिपादनात्" ज्योतिश्चरणा भिधानात्" इत्यादिषु परस्य ब्रह्मणो भारूपत्वावगतेश्च पूर्वपक्षा- नुत्थानादयुक्तम्, सूत्राक्षर वैरूप्यं च । कोई ( श्री शंकर ) "अनुकृते स्तस्य च" अपिस्मर्यते" इन दो सूत्रों, को, अन्य प्रकरण की "उसके प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होते हैं, उसी से यह सारा जगत प्रकाशित है" इत्यादि श्रुति के परब्रह्मत्व का निर्णायक बतलाते हैं। यह बात कुछ जचती नहीं, क्योंकि-'अदृश्यत्वादि' द्युम्वाद्यायतन "आदि दोनों अधिकरणों में परब्रह्म विषयक प्रतिपादन किया गया है। "ज्योतिश्चरणाभिधान" इत्यादि में भी परब्रह्म के भारूप की अवगति हो जाती है, इसलिए पुनः उसी विषय को यहाँ भी उठाना, अयुक्त है तथा सूत्राक्षरों से विपरीत है।