श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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६ प्रमिताधिकरण— शब्दादेव प्रमितः ।१।३।२३॥ कठवल्लीषु श्रूयते—“अंगुष्ठमात्रो पुरुषः मध्य आत्मनि तिष्ठति, ईशानोभूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ।” एतद्वैतत् “अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः, ईशानोभूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः” एतद्वैतत्—“अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदाजनानां हृदये संन्नि- विष्टः तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन् मुंजादिवैषीकां धैर्येण तं विद्याच्छु- क्रममृतम्” इति । तत्रसंदिह्यते—किमयमंगुष्ठमात्र प्रमितः प्रत्यगात्मा, उतपरमात्मा इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? जीवस्यान्य- त्रांगुष्ठमात्रत्वश्रुतेः “प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः, अंगुष्ठमात्रः रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः” . इति । न चान्यत्रो- पासनार्थंतयाऽपि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वं श्रूयते । एवं निश्चिते जीवत्वे ईशानत्वं शरीरेन्द्रियभोग्यभोगोपकरणापेक्षयाऽपि भवि- ष्यति । कठवल्ली की श्रुति है कि—“अंगुष्ठ परिमाण वाला पुरुष आत्मा में अवस्थित है, वही भूत और भविष्य का शासक है, उन्हें जान लेने वह किसी की निन्दा नहीं करता—यही है वह—(जिसके लिए तुमने पूछा था) अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष धूमरहित ज्योति के समान है, वही भूतभविष्य का शासक है, वही आज है और कल भी रहेगा—यही है वह—सबका अंतर्यामी अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला पुरुष, सदैव प्राणियों के हृदय में स्थित है, उसे मूंज से सींक भाँति ( जैसे कि सींक मूंज से भिन्न है ) अपने शरीर से धीरतापूर्वक पृथक् करके देखे, उसी को अमृत स्वरूप समझे ।” अब संशय होता है कि—यह अंगुष्ठ परिमाण वाला प्रमित, जीवा- त्मा है परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा । क्योंकि—अन्य श्रुतियों में जीव को अंगुष्ठ परिमाण वाला कहा गया है—जैसे कि—“प्राणों का ankurnagpal108@gmail.com