श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०८ ) अधिपति अपने कर्मों से प्रेरित होकर अनेक योनियों में विचरता हुआ, जो कि अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला है, वह सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप, सकल्प और अहंकार से युक्त है।" किसी भी श्रुति में उपासना के लिए, परमात्मा के अंगुष्ठ परिमाण का वर्णन भी नही मिलता । इस प्रकार प्रमित की जीवता निश्चित हो जाने पर-शरीर-इन्द्रिय भोग्य और भोगोपकरण इत्यादि में जीव की शासकता भी निश्चित हो सकती है। सिद्धान्तः—इति प्राप्ते ब्रूमः—शब्दादेव प्रमितः—अंगुष्ठ प्रमितः परमात्मा, कुत. ? "ईशानो भव्यस्य" इति शब्दादेव । न च भूत भव्यस्य सर्वस्येशितृत्वं कर्मपरवशस्य जीवस्योपपद्यते । उक्त संशय पर सिद्धात रूप से "शब्दादेवप्रमित " सूत्र प्रस्तुत किया गया, जिसका तात्पर्य है कि-अंगुष्ट प्रमित परमात्मा है "ईशानो- भूतभव्यस्य" शब्द से ही उसकी परमात्मकता सिद्ध होती है। कर्म परवश जीवात्मा में भूत भविष्य आदि समस्त की शासकता संभव नही है। कथं तर्हि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वमित्यत्राह- परमात्मा की अंगुष्ठ मात्रता कैसे संभव है ? इस पर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥१।३।२४॥ परमात्मन उपासनार्थमुपासक हृदये वर्त्तमानत्वादुपासक हृदय- स्यांगुष्ठ प्रमाणत्वात्तदपेक्षयेदमंगुष्ठ प्रमितत्वमुपपद्यते । जीवस्यापि अंगुष्ठ प्रमितत्वं हृदयांतर्वर्तित्वात्तदपेक्षमेव, तस्याराग्रमात्रत्वश्रुतेः । मनुष्याणामेवोपासकत्व संभावनया, शास्त्रस्यमनुष्याधिकारत्वात् मनुष्य हृदयस्य च तत्तदंगुष्ठ प्रमितत्वात्खरतुरगभुजगादीनामनंगुष्ठ प्रमितस्वेऽपि न कश्चिद्दोषः स्थितं तावदुत्तरत्र समापयिष्यते । मनुष्य का हृदय अंगुष्ठ परिमाण का है, उसमें परमात्मा की उपासना की जाय, इसलिए आयतन के अनुरूप, परमात्मा के अंगुष्ठ परिमाण का वर्णन किया गया है। जीवात्मा के लिए भी जो अंगुष्ठ ankurnagpal108@gmail.com