भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५०६ ) परिमाण का वर्णन मिलता है, वह भी हृदय के परिमाणानुसार ही है, अन्यथा श्रुतियों में तो जीव को आरा के अग्रभाग के समान अतिसूक्ष्म बतलाया गया है । उपासना मनुष्यों से ही संभव हो सकती है, शास्त्र का अधिकार भी मनुष्य का ही बतलाया गया है । मनुष्य का हृदय अपने अपने अंगुष्ठ परिमाण का होता है । गर्दभ घोड़ा सर्प इत्यादि का तो अंगुष्ठ परिमाण का प्रश्न ही नहीं उठता; जीव के अंगुष्ठ परिमाण पर किसी प्रकार की शंका का अवकाश भी नहीं है । इस विषय को अग्रिम अधिकरण में समाप्त करेंगे । ७ देवताधिकरणः- तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ।१।३।२५॥ परस्य ब्रह्मणोंऽगुष्ठप्रमितत्वोपपत्तये मनुष्याधिकारं ब्रह्मोपास- नशास्त्रमित्युक्तम् । तत्प्रसंगेनेदानीं ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्य- धिकारोऽस्ति नास्तीति विचार्यते । किं तावद्युक्तम् ? नास्ति देवा- दीनामधिकार इति, कुतः ? सामर्थ्याभावात्-न हि अशरीराणां देवादीनां विवेकविमोकादि साधनसप्तकानुगृहीत ब्रह्मोपासनोपसंहार- सामर्थ्यमस्ति । न च देवादीनां सशरीत्वे प्रमाणमुपलभामहे । यद्यपि परिनिष्पन्नेऽपि वस्तुनि व्युत्पत्ति संभावनया वेदांतवाक्यानि परे ब्रह्मणि प्रमाणभावमनुभवंति, तथापि देवादीनां विग्रहवत्त्व प्रति- पादन परं न किंचिदपि वाक्यमुपलभ्यते । मंत्रार्थवादास्तु कर्मविधि- शेषतयाऽन्यपरत्वान्न देवादि विग्रह साधने प्रभवंति । कर्मविधयश्च स्वापेक्षितोद्देश्यकारकत्वातिरेकि देवतागतं किमपि न साधयंति । अतएव तासामर्थित्वमपि न संभवति । अतः सामर्थ्यार्थित्वयोरभा- वाद्देवादीनां अनधिकारः- इति । परब्रह्म के अंगुष्ठमात्र परिमाण के प्रतिपादन का एकमात्र अभिप्राय है कि—मनुष्यमात्र का ही ब्रह्मोपासना का अधिकार है, इसी- लिए शास्त्रों में उन्हें ही अधिकारी माना गया है । इसी प्रसंग में विचार ankurnagpal108@gmail.com