भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५१० ) उपस्थित होता है कि-ब्रह्मविद्या (उपासना) में देवता आदि का भी अधिकार है या नहीं ? कह सकते हैं कि नहीं है, क्योंकि देवतादि में सामर्थ्य नहीं है, अशरीरी देवता आदि में विवेक-विमोक आदि सप्त प्रकार की साधनाओं की सहायता से ब्रह्मविद्या को ग्रहण करने का सामर्थ्य ही नहीं है। उन लोगों के शरीरी होने का कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। यद्यपि शब्द द्वारा स्वतः सिद्ध ( क्रिया संबंध रहित ) वस्तु में व्युत्पादन की संभावना से वेदांत वाक्यों को परब्रह्म के संबंध में प्रमाण माना जा सकता है, फिर भी देवताओं के शरीरी होने के प्रमाण कहीं भी नहीं मिलते। मंत्र और अर्थवाद वाक्य भी, जो कि-कर्म विधि के अंगरूप से वर्णित हैं, अन्यार्थ बोधक हैं। देवताओं के शरीर अस्तित्व को प्रमाणित करने में वे भी असमर्थ हैं। कर्मविधि समूहक वाक्य भी, देव- ताओं के संबंध में, कर्मापेक्षित उद्देश्य के प्रतिपादन के अतिरिक्त कुछ और प्रमाणित नहीं कर पाते। इसलिए उनका अर्थित्व भी संभव नहीं है। सामर्थ्य और अर्थित्व के अभाव होने से, देवादिकों का, ब्रह्मविद्या में अनाधिकार सिद्ध होता है। सिद्धान्तः-एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-‘‘तदुपर्य्यपि बादरायणः संभवात्’’-तदुपरि अपि, तद् ब्रह्मोपासनं उपरि-देवादिष्वपि, संभवतीति बादरायणो मन्यते। तेषामर्थित्व सामर्थ्ययोः संभवात् । अर्थित्वंतावद् आध्यात्मिकादिदुर्विषहदुःखाभितापात् परस्मिन् ब्रह्मणि च निरस्तनिखिल दोषगंधेऽनवधिकातिशयासंख्येय कल्याण- गुणगणे निरतिशय भोग्यत्वादिज्ञानाच्च संभवति । सामर्थ्यमपि पटुतरदेहेन्द्रियादिमत्तया संभवति । देहेन्द्रियादिमत्वं च ब्रह्मादीनां सकलोपनिषत्सु सृष्टि प्रकरणेषु उपासनप्रकरणेषु च श्रूयते । तथाहि-‘‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत् तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्’’ इत्यारभ्य-सर्वमचेतनं तेजोवन्नप्रमुखावस्थ्याविशेषवद् व्याकृत्य-‘‘अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’’ इति संकल्प्य ब्रह्मादिस्थावरान्तं चतुर्विधंभूतजातं तत्तत्कर्मोचित्,