भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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हो ऐसा कहा गया है कि-उन भगवान पुरुषोत्तम ने प्रलयावसान के समय पूर्व कल्पनीय संस्थान विशेष जगत का स्मरण करके “अनेक होऊँ' ऐसा संकल्प करके, केवल शक्ति रूप से स्वयं में विलीन भोग्य और भोक्तृ समूह को पृथक् पृथक् करके, महत्तत्व से लेकर ब्रह्मांड तक सृष्टि करके, हिरण्यगर्भ को उसका उपदेश देकर उन्हें पूर्व कल्पानुसार जैसी की जैसी आकृति वाले देव आदि समस्त जगत की सृष्टि में नियुक्त करके, स्वयं अन्तर्यामी रूप से सृष्ट जगत में प्रविष्ट हो गए इस प्रकार उक्त संशय का समाधान हो जाता है। इसी से वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता भी प्रमाणित हो जाती है। वेदों का जो पूर्व पूर्व उच्चारण क्रम जन्य संस्कार है, उसी क्रम विशेष का स्मरण करके, सदा उच्चारण करना चाहिए, यह नियम हम लोगों और सर्वेश्वर दोनों के लिए समान है। सर्वेश्वर में, हमसे एक ही विशेषता है कि-वह पूर्व संस्कार निरपेक्ष होकर स्वयं ही अनुसंधान या स्मरण करते हैं [जब कि हम लोग पूर्व संस्कारा- नुसार ही स्मरण करने के लिए बाध्य हैं ] कुत इदं यथोक्तभवगम्यत इति चेत् ? तत्राह-दर्शनात् स्मृतेश्च । दर्शनं तावत् -"यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै" इति । स्मृतिरपि मानवी-"आसीदिदं तमोभूतम्" इत्यारभ्य- 'सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः, अतएव ससर्जादौ तासु वीर्यमपासृजत्, तदण्डमभवद् हैमंसहस्रांशु समप्रभम् । तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः" इति । यथा पौराणिकी- "तत्र सुप्तस्य नाभौ पद्मभजायत तस्मिन् पत्मे महाभाग वेदवेदां- गपारणः, ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजाः सृज महामते ।" तथा - "परोनारायणो देवः तस्याज्जातश्चतुर्मुखः" इति । तथा "आदि- सर्गमहं वक्ष्ये" इत्यारभ्योच्यते-"सृष्ट्वा नारं तोयमंतः स्थितोऽहं येनस्यान्मे नाम नारायणेति, कल्पेकल्पेऽतत्र शयामि भूयः सुप्तस्य मे नाभिजं स्याद्यथाऽब्जं, एवम्भूतस्य मे देवि नाभिपद्मे चतुर्मुखः, उत्पन्नस्यमया चोक्तः प्रजाः सृजत् महामते" इति ।