श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१६ ) विनष्टस्य वेदस्य नित्यत्वं ? अतो वेद नित्यत्ववादिना देवादीनां विग्रहवत्त्वाऽभ्युपगमेऽपि लोक व्यवहारस्य प्रवाहानादिताऽश्रयणी- येति ? अत्रोत्तरं पठति— शंका—नैमित्तिक प्रलय के समय तो, ब्रह्म पूर्व सृष्ट्यानुसार वेद वाक्य स्मरण पूर्वक, आकृति विशेष इन्द्र आदि की सृष्टि कर लेते हैं, ऐसा तो मान भी सकते हैं, पर प्राकृत प्रलय में जब कि-सृष्टिकर्त्ता प्रजापति एवं भूतोपादान अहंकार के परिणाम स्वरूप शब्द का भी लय हो जाता है, तब प्रजापति की शब्दानुस्मरण पूर्विका सृष्टि कैसे संभव होगी, तथा विनष्ट वेदों की नित्यता भी कैसे रहेगी ? इसलिए वेद- नित्यता वादी, देवादिकों की देह सत्ता स्वीकारने पर भी, जो लोक व्यवहार में अनादि प्रवाह रूपता है, उसका समर्थन कैसे करेंगे ? इसी का उत्तर देते हैं— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥१।३।२८॥ कृत्स्नोपसंहारे जगदुत्पत्त्यावृत्तावपि पूर्वोक्तात्समाननामरूप- त्वादेव न कश्चिद विरोधः । तथाहि—स भगवान् पुरुषोत्तमः प्रलयावसान समये पूर्वसंस्थानं जगत्स्मरन् “बहुस्याम्” इति संकल्प्य भोग्यभोक्तृजातं स्वस्मिन् शक्तिमात्रावशेषं प्रलीनं विभाव्य महदादि ब्रह्माण्डं हिरण्यगर्भ पर्यन्तं यथापूर्वं सृष्ट्वा वेदांश्च पूर्वानुपूर्वी- विशेष संस्थानाविष्कृत्य हिरण्यगर्भायोपदिश्य पूर्ववदेव देवाद्याकार- जगत्सर्गे तं नियुज्य स्वयमपि तदन्तरात्मतयाऽवतस्थे । अतो यथोक्तं सर्वमुपपन्नम् । एतदेव च वेदस्यापौरुषेयत्वं नित्यत्वं च, यत्पूर्वपूर्वोच्चारणक्रमजनितसंस्कारेण तमेव क्रमविशेषं स्मृत्वातेनैव क्रमेणोच्चार्यत्वम् तदस्मासु सर्वेश्वरेऽपि समानम् । इयांस्तु विशेषः— संस्कारानपेक्षमेव स्वयमेवानुसंधत्ते पुरुषोत्तमः । प्राकृत प्रलय के बाद पुनः सृष्टि होने पर, पूर्वकथित समान नाम और रूप की संभावना में भी, कोई विरोध नहीं आता । देखिये वेदों में ankurnagpal108@gmail.com