भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५१८ ) एव "मंत्रकृतो वृणोते" नम ऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः "अयं सोऽग्निरिति विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादिभिर्वशिष्ठादीनां मंत्रकृत्व कांडकृत्व ऋषित्वार्दौ प्रतीयमानेऽपि वेदस्य नित्यत्वमुपपद्यते । एभिरेव "मंत्रकृत वृणीते" इत्यादिभिर्वेदशब्दैः तत्तत्कांडसूक्त मंत्रकृताऋषीणामाकृति शक्त्यादिकं परामृश्य, तत्तदाकारान् तत्तच्छक्ति युक्तांश्च सृष्ट्व् प्रजापतिस्तानेव तत्तन्मंत्रादिकरणे नियुंक्ते । तेऽपि प्रजापतिन आहित शक्त्यस्तत्तदनुगुणं तपस्तप्त्वा नित्यसिद्धान्पूर्वं पूर्वं वशिष्ठादि दृष्टान् तानेव मंत्रादीन् अनधीत्यैव स्वरतोवर्णतश्चास्वलितान्प श्यंति । अतश्च वेदानां नित्यत्व मेषां च मंत्रकृत्वमुपपद्यते । जैसे कि-देवता और ऋषिवाची, इंद्र वशिष्ट आदि शब्द आकृति विशेष के बोधक है, उनका स्मरण करके ही उनकी सृष्टि की जाती वैसे ही "मंत्रकृतोवृणीते-नमोऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः-अयं सोऽग्निरि विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादि वेदवाक्यों में, वशिष्ठ आदि क मंत्र कर्तृता, कांड कर्तृता, तथा ऋषित्व आदि की प्रतीति होते हुए भ वेदों की नित्यता अक्षुण्य रहती है। क्यों कि-"मंत्रकृतोवृणीते" इत्या शब्दों के आधार पर, प्रजापति उन-उन मंत्रों, सूक्तों और काण्ड कर ऋषियों की रचना कर, उन्हीं को उन मंत्रादि कार्य संपादन में नियुक्त करते है प्रजापति से प्राप्त शक्ति द्वारा वे ऋषि भी अपने-अपने कर्त्तव्य नुकूल तपश्चर्या द्वारा, अध्ययन पूर्वक, पूर्व-पूर्व वशिष्ठ आदि, दृष्ट नित्यसिद्ध मंत्रराशि का, यथायथ (जैसे का जैसा ही) स्वर और वर्ण अनुसार अविकल साक्षात्कार कर लेते हैं। इस प्रकार वेदों की नित्यत एवं वशिष्ठादिकों की मंत्रकर्त्तृता सिद्ध हो जाती है। अथस्यात्- नैमित्तिक प्रलयादिषु इन्द्रादि उत्पत्तौ वेदशब्देभ पूर्वं पूर्वेन्द्रादिस्मरणेन प्रजापतिना देवादिसृष्टिरुपपद्यतां ना प्राकृतप्रलये तु स्रष्टुः प्रजापतेः भूतादि अहंकार परिणाम शब्दर च विनष्टत्वात् कथं प्रजापतेः शब्द पूर्विका सृष्टिरुत्पद्यते ? कथन्त ankurnagpal108@gmail.com