श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१७ ) तथा-“स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत, स भुव इति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत्” इत्यादि । वाचक शब्द पूर्वकं तत्तदर्थं संस्थानं स्मरन् तत्तदर्थ संस्थान विशिष्टं तंतमर्थं सृष्टवानित्यर्थः । स्मृतिरपि-“अनादिनिधना ह्येषा वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा आदौ वेदमयी दिव्या यतस्सर्वाः प्रसूतयः” इति । “सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्, वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे” । संस्था संस्थानानि रूपाणीति यावत् । तथा “नामरूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपंचनम्, वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः” इति अतो देवादीनां विग्रहवत्वेऽपि वैदिक शब्दानामा- नर्थक्यं, वेदस्यादिमत्वं न प्रसज्यते । यदि पूछें कि-तुम कैसे जान सके ? प्रत्यक्ष से या अनुमान से श्रुति या स्मृति से ? तो भाई श्रुति ही का वचन है “प्रजापति ने वेद से, सत् और असत् इन दो रूपों को प्रकट किया” तथा “उन्होंने भू शब्द से भूमि की, भुवः शब्द से अंतरिक्ष की, सृष्टि की” इत्यादि से ज्ञात हुआ कि- पदार्थ वाचक शब्दों का स्मरण करते हुए विशेष, विशेष पदार्थों के संस्थान आकृति विशेष का स्मरण करके, उन-उन आकृति विशेषों की सृष्टि की। स्मृति में भी इसी प्रकार-“स्वयम्भू ने सर्व प्रथम अनादि निधन वेदमय, दिव्य वाक्य प्रकाश किया, जिससे कि सारी सृष्टि होती है”- उस आदि पुरुष ने सर्वप्रथम वैदिक शब्दों से ही पृथक्-पृथक् नाम-कर्म एवं विभिन्न प्रकार के संस्थानों का निर्माण किया”-“उन्होंने, देव आदि समस्त भूतों के नाम रूप एव विविध कर्त्तव्य विषयों की वैदिक शब्दों से ही सृष्टि की” इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि-देव आदि के शरीरी होते हुए भी, वैदिक शब्दों की नित्यता में कोई अंतर नहीं आता । अतएव च नित्यत्वम् ।१।३।२८॥ यत एवेन्द्र वशिष्ठादिशब्दानां देर्षिवाचिनां तत्तदाकारं वाचित्वं, तत्तच्छब्देन तत्तदर्थस्मृतिपूर्विका च तत्तदर्थसृष्टिः, तत ankurnagpal108@gmail.com