श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१६ ) वैदिकानामर्थशून्यत्वमनित्यत्वं वा वेदस्य स्यादिति चेत्—तन्न-अतः प्रभवात्-अस्मादिन्द्रादिशब्दादेव पुनः पुनरिन्द्राद्यर्थस्य प्रभवात् । एत- दुक्तं भवति-यदि देवदत्तादिशब्दवदिन्द्रादि शब्दा वैदिका व्यक्ति विशेष मात्रे संकेत पूर्वकाः प्रवृत्ताः, अपितु स्वभावत एव गवादि शब्दवत् आकृति विशेष वाचित्वेन, ततश्चैकस्यामिन्द्र व्यक्तौ विनष्टा- यामत एव वैदिकादिन्द्रशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानादवगततद्वाच्य भूतेन्द्राद्यर्थकारो धाता तदाकारमेवापरमिन्द्रं सृजति, यथा कुलालो घटशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानात्तदाकारमेव घटम् इति । ( संशय ) ठीक है, कर्म में विरोध भले ही न हो पर वैदिक शब्दों में तो विरोध होने की सभावना है, क्योंकि—जब देवताओं का शरीर मानेगे तो, उनका उपचय-अपचय-विनाश आदि भी मानना ही पड़ेगा । शरीर मानने पर उनके अवयव भी मानेगे ही, अवयव नित्य होते नहीं, इसलिए इन्द्रादि की अनित्यता भी माननी पड़ेगी । देवदत्त आदि शब्दों की तरह, वैदिक इन्द्रादि शब्दो को भी अनित्य मानना होगा । इन्द्र की उत्पत्ति के पूर्व और विनाश के बाद, फिर—वेदों में वर्णित इन्द्र का अस्तित्व ही क्या रह जायगा ? इन्द्र के अस्तित्व के सशयित हो जाने पर वेदों का अस्तित्व और नित्यता भी संशयित हो जावेगा । इत्यादि ( समाधान ) उक्त संशय असंगत है; इन्द्र आदि शब्द वेद में नित्य ही है, इन्द्र आदि का भले ही पुनः पुनः उद्भव अनुद्भव होता रहे, पर इन्द्र आदि शब्द, देवदत्त आादि शब्द की तरह, व्यक्ति विशेष के बोधक नहीं हैं, अपितु गो आदि शब्द की तरह आकृति विशेष के वाचक है । एक इन्द्र के विनष्ट हो जाने पर भी, वैदिक आकृति विशेष इन्द्र शब्द का मानसिक चिन्तन करके, विधाता, उसी आकार प्रकार के इन्द्र का सर्जन कर देते हैं, जैसे कि—कुम्हार, घट शब्द संपन्न आकार विशेष का चिन्तन, विनष्ट घट के समान अन्य घट का निर्माण कर देता है । कथमिदमवगम्यते ? प्रत्यक्षानुमानभ्यां—श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थं श्रुतिस्तावद्-“वेदेन रूपे व्याकरोत् सतासतो प्रजापतिः” इति । ankurnagpal108@gmail.com