भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ५२२ ) योऽन्ये संभवंति । न च वस्वादीनां सतां वस्वादित्वं प्राप्यं भवति, प्राप्तत्वात्, मधुविद्यायामृग्वेदादि प्रतिपाद्यकर्मनिष्पाद्यस्य रश्मि द्वारेण प्राप्तस्य रसस्याश्रयतया लब्धमधुब्दपदेशस्यादित्यस्यांशानां वस्वादिभिर्भुज्यमानानामुपास्यत्वंवस्वादित्वं च प्राप्यं श्रूयते- “असौ वा आदित्यो देवमधु” इत्युपक्रम्य-“तद्यत्प्रथमममृतं वेद वसूनामेवैकोभूत्वा अग्निनैव मुखेनैतदेवामृतम् दृष्ट्वा तृप्यति” इत्यादिना । ब्रह्मविद्या में देवादिक का अधिकार है, यह तो सिद्ध हो चुका। अब प्रश्न होता है कि- उपासनाओं में प्रायः उन सभी देवताओं की उपा- सना का विधान है, जिनके अधिकार की चर्चा की जा रही है,, उन्हें स्वयं अपनी उपासना करने का अधिकार है या नहीं ? जैमिनि आचार्य का मत है कि-मधु आदि विद्याओं में देवताओं का अधिकार नहीं है क्यों कि- ऐसा होना असंभव है, आदित्य वसु आदि देवता ही उक्त विद्याओं के उपास्य हैं, वे स्वयं उपासक कैसे हो सकते हैं ? वसु आदि को उपासना से वसु आदि का साक्षात्कार तो हो नहीं सकता, क्यों कि वे स्वयं तो उपा- सक रूप से उपस्थित हैं ही वे ही फिर उपास्य रूप से कैसे प्रकट हो सकते हैं । जैसा कि-मधु विद्या में, ऋग् वेदादि प्रतिपाद्य कर्म निष्पन्न मधुनामक आदित्य की रश्मियों द्वारा निस्यूत रस, उपास्य वसु आदि से [L